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नीतीश सरकार की उपेक्षा और भू-माफियाओं के आतंक से दम तोड़ते बिहार के तालाब

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प्रतीकात्मक फोटो, साभार, thesourcemagazine.org

सचिन झा शेखर | पटना

वर्ष 1996 में प्रसिद्ध पर्यावरणविद, लेखक और पत्रकार अनुपम मिश्र ने आठ साल के गहन शोध के बाद “आज भी खरे हैं तालाब” नामक पुस्तक लिखी थी। भारत में बेजोड़ सुंदर तालाबों की कैसी भव्य परंपरा थी। ये किताब इस बात का पूरा दर्शन कराती है। किताब में तालाब बनाने की विधियों के साथ-साथ संरक्षण पर भी गहराई से चर्चा की गई है। समुद्र तटीय और नदी के घाटी वाले इलाकों को अगर छोड़ दिया जाए तो आज भी सिंचाई के लिए दूसरे क्षेत्रों में तालाब ही मुख्य स्रोत है। बिहार जैसे लेंड लॉक्ड स्टेट की अर्थव्यवस्था का एक बहुत ही बड़ा हिस्सा तालाब और उसके उत्पादों पर निर्भर करता है। मिथिलांचल के 22 ज़िलों के लाखों लोग मखाना और मछली से जुड़े उद्योगों पर अपने जीवन यापन के लिये निर्भर हैं।

बिहार में तालाबों की संख्या
इंडिया वाटर पोर्टल की साल 2017 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार राज्य में कुल तालाबों की संख्या 97982 है। जिसमें सरकारी तालाब 31,254 है, जबकि निजी तालाबों की संख्या 66728 है। तालाबों के मामले में मधुबनी ज़िला अग्रणी है जहां 4864 सरकारी तालाब हैं। वहीं निजी हाथों में कुल 5891 तालाब हैं। सबसे कम तालाब जाहानाबाद में हैं। जहां सरकारी हाथों में 123 और निजी हाथों में कुल 23 तालाब हैं। पोर्टल की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार राज्य में आज से लगभग 20 साल पहले तालाबों की संख्या लगभग 2.50 लाख के आसपास थी।

क्रमांक जिला सरकारी प्राइवेट
1 पटना 1005 241
2 भोजपुर 685 159
3 बक्सर 463 190
4 रोहतास 2100 93
5 गया 1063 331
6 जहानाबाद 107 23
7 औरंगाबाद 1169 1586
8 नवादा 436 290
9 नालंदा 824 1335
10 अरवल 284 107
11 कैमूर 623 328
12 मुजफ्फरपुर 1386 2586
13 वैशाली 691 1228
14 समस्तीपुर 1334 2569
15 सारण 981 510
16 सीवान 1029 1107
17 गोपालगंज 850 355
18 पूर्वी चम्पारण 1242 5009
19 पश्चिमी चम्पारण 760 2462
20 शिवहर 109 163
21 सहरसा 211 2963
22 सुपौल 202 3551
23 मधेपुरा 163 387
24 पूर्णिया 551 785
25 अररिया 377 4783
26 किशनगंज 280 288
27 कटिहार 868 6767
28 भागलपुर 796 1471
29 बांका 808 3503
30 मुंगेर 215 513
31 जमुई 169 153
32 खगड़िया 490 1201
33 बेगूसराय 301 4447
34 लखीसराय 260 1444
35 शेखपुरा 358 88
36 दरभंगा 2355 6758
37 मधुबनी 4864 5891
38 समस्तीपुर 1245 1083
       

कभी तालाबों का जिला था दरभंगा
बिहार में तालाब का इतिहास काफी पुराना रहा है। ‘पग-पग पोखरि माछ-मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान’। ये पंक्तियां मिथिलांचल की पहचान रही है। मतलब यहां तालाबों की कभी कमी नहीं रही। दरभंगा को तालाबों का ज़िला कहा जाता था। लेकिन तीव्र विकास गति को पाने के लिए लोगों ने शहर के आधे से अधिक तालाब पर कब्ज़ा कर लिया।

सरकार की उपेक्षा और भू-माफियाओं के आतंक से दम तोड़ते तालाब
दरभंगा और मधुबनी के कई ऐतिहासिक तालाब सरकार की उपेक्षा और भूमि मफियाओं के बढ़ते आतंक के चलते दम तोड़ रहे हैं। बीते दिनों मधुबनी के खिरहर थाना क्षेत्र के हिसार गांव में दबंगों के द्वारा तालाब का अतिक्रमण कर लिए जाने के विरोध में मछुआरों ने सड़क जाम कर दिया था।

मधुबनी के ऐतिहासिक तालाब पर दबंगों का कब्जा
मधुबनी ज़िला स्थित खोजपुर गांव में भी दबंगों ने ऐतिहासिक तालाब पर कब्जा कर लिया है स्थानीय निवासी रंजित कुमार झा बताते हैं कि, कुछ समय पहले तक इस तालाब में गांव के मल्लाह समुदाय के लोग सरकारी आदेश पर मछली पालन करते थे, लेकिन भूमि माफियाओं द्वारा इस तालाब पर कब्ज़ा कर लिया गया।

मधुबनी के एक तालाब पर अतिक्रमण किए जाने का विरोध करते मछुआरे समाज के लोग। फोटो- सचिन झा शेखर।

सवर्णों ने तालाब पर अतिक्रमण कर दलितों से छीनी रोजी-रोटी
पर्यावरण सरंक्षण के मुद्दे पर संघर्ष करने वाले पत्रकारों की एक टीम ने खोजपुर के इस तालाब के अतिक्रमण की शिकायत NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) में की है। गांव के ही दलित समुदाय से आने वाले एक युवक ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि ‘गांव के सवर्णों ने अपने बसोवास की ज़मीन को बढ़ाने के लिए उन लोगों की रोज़ी रोटी छीन ली।

अतिक्रमण का शिकार हुआ खोजपुर का एक तालाब। फोटो- सचिन झा शेखर

ग्राउंड रिपोर्ट : कैसे खत्म किए गए तालाब
बिहार के सरकारी कागजों में राजधानी पटना में सरकारी तालाबों की संख्या 1005 है, लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। आधे से अधिक तालाब को खत्म कर दिया गया है। फुलवारीशरीफ में करीब 35 एकड़ के तालाब को भरकर एम्स का निर्माण करा दिया गया। तारामंडल, नेताजी सुभाष पार्क, इको पार्क, दरोगा प्रसाद राय रोड में विधायक आवास, खाद्य निगम कार्यालय, बिस्कोमान कॉलोनी, रेलवे सेंट्रल अस्पताल, संदलपुर सहित कतिपय कॉलोनी शहर के बीच तालाबों को भर दिया गया।

तालाबों पर संकट के बादल
शहर के बीच कुछ तालाब बचे हैं, जो संकट में हैं। कच्ची तालाब, सचिवालय तालाब, मानिकचंद तालाब और अदालतगंज तालाब हैं, लेकिन अब इन पर विलुप्त होने का संकट मंडरा रहा है। अशोक राजपथ और कंकड़बाग के बीच सैदपुर और संदलपुर गांव आता है जहां करीब 74 एकड़ का जलाशय हुआ करता था। सरकारी दस्तावेज में इस जलाशय का उल्लेख गोनसागर तालाब के नाम से है। इसमें सिंघाड़ा (पानी फल) की खेती होती थी। मछली पालन होता था। शहरी विकास में इस तालाब के आसपास लोगों ने पहले झोपड़ी बनाई फिर कॉलोनी बसा ली। अब 5 और 6 मंजिल की इमारत खड़ी हो चुकी है। सैकड़ों लॉज का निर्माण हो चुका है।

पटना: अपने अस्तित्व के लिए लोगों से संघर्ष कर रहा गोनसागर तालाब। फोटो- सचिन झा शेखर

आखिर क्यों खत्म हो रहे हैं तालाब?
2011  की जनगणना के अनुसार बिहार सबसे घनी आबादी वाला राज्य है। वहीं अगर प्रदेश के जनसंख्या घनत्व की बात की जाए तो वह 1106 प्रति वर्ग किलोमीटर तक पहुंच चुका है। राज्य में लगातार ज़मीन की दरों में तेज़ी देखने को मिल रही है। हाल ही में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई थी। प्राचीन काल में तालाब निर्माण को धर्म और संस्कृति से जोड़ कर रखा गया था लेकिन हाल के वर्षों में धार्मिक स्थानों पर भी अतिक्रमण होते चले गये।

सरकारी विभागों के बीच तालमेल की कमी
बिहार जैसे राज्य में सरकारी योजनाओं के कारण और लोगों ने खुद के प्रयास से अपने लिए जल के स्रोत की व्यवस्था कर ली है जिस कारण लोग अब अपने दिनचर्या के लिए तालाब और पोखर पर कम निर्भर रहने लगे हैं। लेकिन सबसे अहम कारक सरकारी उदासीनता है। बिहार में तालाबों को कब्जे से मुक्त कराने का काम इसलिए भी ढंग से नहीं हो पा रहा है क्योंकि बिहार में तालाबों की सुरक्षा, साफ-सफाई और कब्ज़ा मुक्ति का काम शहरी क्षेत्रों में नगर विकास, ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण कार्य विभाग, मत्स्य पालन, अधिक क्षेत्रों में पशु व मत्स्य पालन और अन्य क्षेत्रों में भूमि राजस्व सुधार विभाग देखता है। इन विभागों के बीच बेहतर समन्वय और तालमेल न होने के चलते तालाब या तो लुप्त हो रहे हैं या अतिक्रमित होते जा रहे हैं।

मछुआरे दबंगों के खिलाफ कानून लड़ाई लड़ने में असमर्थ
इसके अलावा मछुआरा समुदाय की आर्थिक हालात काफी कमज़ोर है, जिस कारण यह वर्ग तालाबों को अतिक्रमित करने वाले दबंगो के साथ कानूनी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं हैं। इस मुद्दे पर वर्षों से मछुआरा समुदाय के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे “सन ऑफ मल्लाह” के नाम से मशहूर मुकेश सहनी कहते हैं कि, पिछले 15 वर्षो में मछुआरों के कल्याण के लिए राज्य सरकार ने कुछ भी नहीं किया है, अगर तालाब और मछुआरों के हित में कोई काम करता है तो हम उसे हर संभव सहयोग करेंगे।

आखिर क्यों ज़रूरी है तालाब
बिहार जैसे राज्यों में माइक्रो इंडस्ट्री को ही बढ़ावा दिया जा सकता है। ऐसे हालात में तालाब और जल आधारित उत्पादों की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। वर्तमान में देश में हो रहे मखाना के कुल उत्पादन में बिहार 88 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। लेकिऩ जिस प्रकार से तालाबों की संख्या लगातार कम हो रही है वो दिन दूर नहीं जब इस प्रतिशत में गिरावट आएगी। मछली उत्पादन के क्षेत्र में भी बिहार में काफी संभावनाएं हो सकती है। मीठे जल की मछली की मांग उपभोक्ताओं के बीच अधिक रही है। बिहार मीठे जल में मछली उत्पादन करने वाला देश का चौथा राज्य है।

तो अग्रणी राज्य बन सकता है बिहार
अगर इस क्षेत्र में प्रयास किया जाए तो बिहार अग्रणी राज्य बन सकता है और बिहार के विकास और रोज़गार के क्षेत्र में क्रांति आ सकती है। लेकिन सरकारी डेटा काफी माय़ूस करने वाला दिखता है। मनरेगा के तहत नए तालाब बनाने के मामले में बिहार 2016-2017 में प्रमुख 10 राज्यों की लिस्ट से भी बाहर है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फार द सेडिएरीडट्रापिक्स के विशेषज्ञ बोन एप्पन और श्री सुब्बाराव का कहना है कि तालाबों से सिंचाई करना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक और अधिक उत्पादक होता है। उनका सुझाव है कि पुराने तालाबों के संरक्षण और नए तालाब बनाने के लिये ‘भारतीय तालाब प्राधिकरण’ का गठन किया जाना चाहिए। पूर्व कृषि आयुक्त बी. आर. भंबूला का मानना है कि जिन इलाकों में सालाना बारिश का औसत 750 से 1150 मिमी है, वहाँ नहरों की अपेक्षा तालाब से सिंचाई अधिक लाभप्रद होती है।

आंध्रप्रदेश की मछलियों पर बढ़ी निर्भरता
लगातार घटते तालाब की वजह से भूमिगत जल स्तर में गिरावट देखने को मिल रहा है। जलीय पशु के ऊपर अस्तित्व का संकट आ गया है। तालाबों की लगातार घटती संख्या के चलते बिहार के प्रमुख शहर भी अब आंध्रप्रदेश की मछलियों पर निर्भर होने लगे हैं। पटना के संदलपुर गांव में मछली बेचने वाले विकास कुमार बताते हैं कि, पटना में तालाब की ताजा मछली उपलब्ध करवाना काफी कठिन काम हो चुका है, पटना में अब तालाब बचे ही नहीं हैं, मजबूरी में हम लोगों को आंध्रा की मछली को तालाब की मछली बताकर ग्राहक को बेचना पड़ता है।



तालाबों के भविष्य पर कोर्ट का फैसला
तालाबों के मामले में कोर्ट का फैसला हमेशा से क्रांतिकारी रहा है। 25 जुलाई 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सिविल अपील संख्या- 4787/2001, हिंचलाल तिवारी बनाम कमलादेवी, ग्राम उगापुर, तालुका आसगांव, जिला संत रविदास नगर के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि जंगल, तालाब, पोखर, पठार और पहाड़ आदि समाज के लिए बहुमूल्य होते हैं इनके अनुरक्षण पर्यावरणीय संतुलन हेतु ज़रूरी है।

इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायलय ने निर्देश दिया कि तालाबों को ध्यान देकर तालाब के रूप में ही बनाए रखना चाहिए। उनका विकास और सौन्दर्यीकरण किया जाना चाहिए। जिससे जनता उसका उपयोग कर सके। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा कि तालाबों के समतलीकरण के परिणामस्वरूप किए गए आवासीय पट्टों को निरस्त किया जाए। आवंटी स्वयं निर्मित भवन को 6 माह के भीतर ध्वस्त कर तालाब की भूमि का कब्जा ग्रामसभा को लौटाएं।

ऐसे ही एक मामले में 2011 में हरिद्वार निवासी पूर्व सैनिक कुंवरपाल सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने आदेश दिया कि छह माह के भीतर राज्य में स्थित तालाबों से अतिक्रमण हटाया जाए।

तालाब को जिंदा रखने के लिए करें ये उपाय
तालाब, पोखर और झीलों के संरक्षण या उसे जिंदा रखने के लिए उसके चारों तरफ पक्के पाथ-वे का निर्माण कर या पौधारोपण कर उसके ऊपर होने वाले अतिक्रमण को रोका जा सकता है।

इसके अलावा सरकारी कानून और आम लोगों के बीच जनजागरण के सहयोग से भी खत्म होते तालाबों को बचाया जा सकता है। तालाबो की सफाई रखरखाव और गहरीकरण कोई बहुत ही खर्चीला कार्य नहीं है न ही इसके लिये किसी बड़ी मशीन की आवश्यकता होती है।

तालाब संरक्षण के लिए गांव के तालाबों को जलकर समूह और सहकारी समूह के हाथों दे देना चाहिए। न्यायालय के आदेशों को राज्य सरकार को गंभीरता पूर्वक लागू करने की जरूरत है।

इसके अलावा ग्राम पंचायत और ग्रामिणों को एक साथ मिलकर तालाब पर अतिक्रमण करने वाले लोगों और दबंगो के खिलाफ अभियान चलाकर तालाब को बचाया जा सकता है।



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