Bihar Elections 2020: बिहार में लिंग आधारित हिंसा और महिलाएं

Women and Gender based Violence in Bihar || Bihar Elections 2020 || बिहार में लिंग आधारित हिंसा और महिलाएं : विगत दशक में बिहार ने उच्च आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन का अनुभव किया है परन्तु महिलाओं की स्थिति में अभी भी कार्य की आवश्यकता है। राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में पिछले एक दशक में अत्याधिक वृद्धि हुई है। वर्ष 2018-19 के एनसीआरबी के आंकड़ों का विश्लेषण बताते है कि बिहार में महिलाओं के खिलाफ हो रहे हिंसा मे अपहरण (50%) ,दहेज उत्पीड़न (20%) बलात्कार (12%) और दहेज मृत्यु (6%) का योगदान हैं (Gender Report Card, 2019)। इसी वर्ष के राज्य स्त्ररीय महिला हेल्पलाइन के आंकड़ों बताते है कि महिलाओं के खिलाफ हो रहे हिंसा मे सर्वाधिक योगदान घरेलू हिंसा (64%) का है, जो घर मे हो रहे उत्पीड़न की ओर इशारा करते हैं। इन आंकड़ों के साथ महिलाओं के खिलाफ हो रहे हिंसा से संबन्धित ‘मौन की संस्कृति’ का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है, जो बिहार जैसे राज्य के सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति में समर्थन करती हैं और जिन्हें घरेलू हिंसा के मामलों की कम रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

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बिहार में लिंग आधारित हिंसा और महिलाएं : COVID-19 के दौरान घरेलू हिंसा के प्रति महिलाओं की स्थिति को और भी कमजोर कर दिया हैं क्योंकि घरेलू स्तर पर आर्थिक मंदी के साथ-साथ सामाजिक अलगाव के कारण हिंसा की संभावना बढ़ गयी हैं। एनसीडबल्यू के अनुसार पहले की तुलना में बिहार से “घरेलू हिंसा” के मामलों के प्राप्त शिकायतों में दोगुनी बढ़ोतरी होनें के कारण देश में हो रहे घरेलू हिंसा के सर्वाधिक मामलों वाले राज्य मे से एक हैं। महिलाओं के नेतृत्व वाले संगठन, जो लिंग आधारित हिंसा के विभिन्न आयामों पर कार्य कर रहे है, का कहना है कि लॉक डाउन के वक्त महिलाओं पर जिस प्रकार के हिंसा हुए वे कई संगठनो के लिए चिता के विषय हैं क्योंकि हिंसा से पीड़ित महिलाओं के पास अपनी बात बताने या किसी प्रकार की मदद पाने की सम्भावनाये कभी कम थी या नहीं थी।

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महामारी के प्रकोप में महिलाओं के उपर हो रहे हिंसा के मामले छुप गए। लॉक डाउन के वक्त महिलाओं के ऊपर होने वाले हिंसा में सबसे ज्यादा शारीरिक और भावनात्मक हिंसा की घटनाये हुई। प्रवाशी लोगों के वापस बिहार आने के कारन घरों में महिलाओं को घरेलु कामों में एवं घर के लोगों की देखभाल करने के लिए काफी वक्त देना पड़ा। इसके कारण महिलाओं के पास खुद के आराम या यहाँ तक की सोने लिए भी वक्त नहीं मिलाता था। पहले से ही समयाभाव से जूझ रही महिलाओं के पतिओं द्वारा बार बार यौन सम्बन्ध की मांग के कारण उनके शारीरिक, भावनात्मक एवं मनोसामाजिक तनाव काफी बढ़ गए।

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बिहार में लिंग आधारित हिंसा और महिलाएं : बिहार बाल विवाह के मामलों से भी प्रभावित है , राज्य के वर्तमान मे 20-24 वर्ष उम्र की महिलाओं मे से 42 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियों का विवाह कानूनी उम्र के पहलें हो गयी थी , परिणाम स्वरूप देश मे बाल विवाह के आंकड़ों मे मात्र बिहार से 11 प्रतिशत लड़कियों का तथा 8 प्रतिशत लड़को मे हो रहे बाल विवाह का योगदान हैं (NFHS 4) महिला विकास निगम के लिए Centre for Catalyzing Change – Sakshamaa के द्वारा किए युवाओं के बीच किये गए एक जनमत सर्वेक्षण में युवाओं ने एक नए व्यापक कानून के साथ-साथ एक मजबूत जागरूकता अभियान तथा दहेज़ लेन-देन करने वाले लोगों के खिलाफ़ सख्त दंड की मांग की हैं। (Ending the practice of dowry in Bihar: Young People’s Perceptions and Recommendations for Action, 2019)। यद्यपि 2012-13 में माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने की दर 62।85% से घटकर 2016-17 में 56।6% हो गई, लेकिन, केवल 48% लड़कियां ही स्कूल में पंजीकृत हैं। गरीबी, शादी और लड़कियों की शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण को लड़कियों के कम नामांकन और उच्च dropout के कुछ प्रमुख कारणों के रूप में माना जा रहा हैं।

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राज्य में हाल के वर्षों में महिलाओं और लड़कियों की शैक्षिक प्राप्ति में आयी तेजी से वृद्धि के बावजूद श्रम झेत्र महिलाओं की भागीदारी संबन्धित परिणामों में परिलक्षित नहीं हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप महिलाओं की भागीदारी मुख्य रूप से घरेलू कार्य ,कृषि तथा पशुपालन तक सीमित है। देश भर मे बिहार की महिलाओं (15-59 वर्ष की आयु में) का श्रम शक्ति मे भागीदारी दर सबसे निचले पायदान पर हैं – मात्र 4।4% है जो की राज्य में पुरुष (15-59 वर्ष आयु वर्ग के) LFPR – 71% ,की तुलना में काफी कम है। लिंग आधारित हिंसा का भाय ही शायद वह कारण है जिससे शहरी आबादी के 50% के करीब होने के बावजूद केवल 19 फीसदी महिलाएँ “अन्य श्रमिक” की श्रेणी में शामिल हैं फिर भी उनकी 84 प्रतिशत यात्राएं सार्वजनिक, मध्यवर्ती सार्वजनिक और गैर-मोटर चालित परिवहन के द्वारा होती हैं (Census 2011)।

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