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20 हज़ार मीट्रिक टन गेहूं पानी में भीगा, हम कब-तक किसान की मेहनत को इस तरह पानी में बहाते रहेंगे

20 Thousand Metric Ton Wheat soaked in rain
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Ground Report | Bhopal

मध्यप्रदेश में इस बार गेहूं की बंपर पैदावार से किसान की आंखे चमचमा उठी थी। राज्य में हुई बंपर पैदावार से खाद्य भंडार लबालब भरने को तैयार थे। लेकिन 35 खरीद केंद्रों पर प्रशासन की लापरवाही ने किसान की मेहनत को पानी में डूबो दिया। मौसम विभाग निसर्ग तूफान की वजह से राज्य में बारिश की संभावना पहले ही जता चुका था। इसके बावजूद खरीद केंद्रों का प्रशासन सोता रहा और खुले में रखा 20 हज़ार मीट्रिक टन अनाज बारिश में भीग गया। समय रहते अगर खुले में रखे गेंहूं को ढंक दिया गया होता तो यह नौबत नहीं आती।

अब तक भोपाल के 64 खरीदी केंद्रों में करीब 29 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी हो चुकी है। यह सारा अनाज परिवहन व्यवस्था न होने की वजह से वेयर हाउस तक नहीं पहुंचाया जा सका है। कलेक्टर ने आदेश जारी कर उचित व्यवस्था करने को कहा था। इसमें कहा गया था कि जहां गेहूं रखा है उसके आसपास पानी की निकासी के लिए नाली बनवाई जाएं। किसानों को नुकसान नहीं होना चाहिए।

4 दिन तक खुले में अनाज पड़ा रहा

नई दुनिया अखबार की खबर के मुताबिक भौंरी बाइपास रोड 11 मील के पास स्थित करतार गेहूं तुलाई केंद्र के बाहर रखा सैकड़ों क्विंटल गेहूं बारिश में भीग गया। बैरागढ़ के पास भैंसाखेड़ी कृषि उपज मंडी में भी गेहूं भीग गया। समय रहते मंडी समिति ने कोई व्यवस्था की नहीं की और न ही बचाव के कोई प्रबंध किए। करतार गेहूं तुलाई केंद्र में 4 दिन पहले अनाज की खरीदी बंद कर दी गई थी। यहां दो लोग कोरोना पॉजिटिव मिलने के बाद इसे बंद कर दिया गया था। यहां वेयर हाउस बना है। ग्राम भैंसाखेड़ी स्थित कृषि उपज मंडी में इस बार सहकारी समितियों ने हजारों क्विंटल गेहूं की खरीदी की है। गेहूं के भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं की गई है। मंडी में लगे शेड भरने के बाद गेहूं को खुले में रख दिया गया था।

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कब यह देश किसान की कद्र करेगा?

कहने को हमारा देश कृषि प्रधान है लेकिन सत्ता में बैठे लोगों ने किसान की कभी कद्र नहीं की। किसान अपनी मेहनत से अनाज उगाता है ताकि देश में हर व्यक्ति को साल भार पेटभर भोजन मिलता रहे। कभी मौसम की मार तो कभी कीट पतंगों के डंक झेलने वाला किसान जब मंडी पहुंचता है तो लंबी-लंबी लाईनों मेें उसे फसल तुलवाने खड़ा कर दिया जाता है। कई बार उसे रात मंडी में ही गुज़ारनी पड़ती है। ताकि उसे उसकी मेहनत का फल मिल जाए। लेकिन वहां प्रशासन केवल वहां खड़ा तमाशा देखता है। 70 साल बाद भी हम किसानों को उसकी फसल का बेहतर दाम दिलवाने में नाकाम हैं। उसकी फसल को सुरक्षित रखने के लिए वेयरहाउस बनाने में नाकाम है। आखिर कब तक हम इसी तरह कृषि प्रधान होने का दंभ भरते रहेंगे?

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