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हिंदू-मुस्लिम अगर भाई-भाई हैं तो कहने की जरूरत नहीं, नहीं हैं तो कहने से क्या फर्क पड़ेगा?

Bengaluru communal violence: social media posts Hindu Muslim
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Ground Report | News Desk | बेंगलुरु में सांप्रदायिक पोस्ट के बाद फैली आग सोशल मीडिया पर अभी तक सुलग रही है। भला हो उन दर्जनभर लोगों का जिन्होंने पास की मंदिर में आग लगाने जा रही भीड़ को ह्यूमन चेन बनाकर रोक दिया। अब आग से ज्यादा इसके और इन लोगों के चर्चे हैं। हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की दुहाई दी जा रही है लेकिन क्या यह दोनों तरफ के तमाम दिलों में धधक रही आग को बुझा पाएगी?

जवाब राही मासूम रजा ने अपने कम चर्चित उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ में बहुत पहले देने की कोशिश की थी।

‘मैं हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई की बात नहीं कर रहा हूं। मैं
यह बेवकूफी क्यों करूं? क्या मैं रोज अपने बड़े
या छोटे भाई से यह कहता हूं कि हम दोनों भाई-भाई
हैं? हिंदू-मुसलमान अगर भाई-भाई हैं तो कहने की
जरूरत नहीं। यदि नहीं हैं तो कहने से क्या फर्क पड़ेगा।’

List of Some Famous Hindu-Muslim couples of India

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राही ने ‘टोपी शुक्ला’ को गंदी गाली का खिताब दिया है। साफ-साफ कहा कि ‘और मैं यह गाली डंके की चोट
पर बक रहा हूं। यह उपन्यास अश्लील है जीवन की तरह।’

बेंगलुरु मामले में मीडिया ने सुर्खी लगाई, ‘विधायक के भतीजे ने लिखी भड़काऊ पोस्ट, हिंसा में 3 की मौत।’

दूसरी हेडलाइन थी, ‘बेंगलुरु में हिंसा, तीन लोग मारे गए, 60 पुलिसकर्मियों सहित कई घायल, 145 गिरफ्तार।’

‘टोपी शुक्ला’ का कथानक कहता है (जैसे इसी दिन के लिए कहा हो), ‘कितनी शर्म की बात है कि हम घर पर मरने वाले और दंगे में मारे जाने में फर्क नहीं कर सकते। जबकि घर पर केवल एक व्यक्ति मरता है और दंगाइयों के हाथों परंपरा मरती है, सभ्यता मरती है, इतिहास मरता है। सूर की राधा मरती है, तुलसी के राम मरते हैं, अनीस के हुसैन मरते हैं।’

‘कोई लाशों के इस अंबर को नहीं देखता। हम लाशें गिनते हैं। 7 आदमी मरे। 14 दुकानें लुटीं। 20 घर फूंके गए।’

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(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं। अमर उजाला और पत्रिका जैसे मीडिया हाउसों में काम कर चुके हैं।)

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