दशकों तक ‘बाबरी’ की लड़ाई लड़ने वाला मुस्लमान, पैग़म्बर की इकलौती बेटी फात्मा की मज़ार ढ़हाए जाने पर आज भी चुप!

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माना जाता है कि मुग़ल शासक बाबर के सेनापति मीर बाक़ी ने अयोध्या में मस्जिद का निर्माण करवाया था जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था। बाबर 1526 में भारत आया था। 1528 तक उसका साम्राज्य अवध (वर्तमान अयोध्या) तक पहुंच गया। 6 दिसंबर 1992 की तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। हज़ारों की संख्या में कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढहा दिया था और एक अस्थाई राम मंदिर बना दिया था। इसके बाद ही पूरे देश में चारों ओर सांप्रदायिक दंगे होने लगे। इसमें करीब 2000 लोगों ने अपनी जान गंवाई।


सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट उपेंद्र मिश्र ने बताया कि अदालत में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि अयोध्या की विवादित ज़मीन पर मुगल सम्राट बाबर द्वारा या उसके आदेश पर 1528 में बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। हालांकि मस्जिद बनाने की तारीख से 1856-57 यानी 325 साल से ज्यादा समय तक विवादित जमीन पर नमाज पढ़ने की बात साबित नहीं हुई। इस दरम्यान विवादित जमीन पर कब्जे को लेकर मुस्लिम पक्षकार कोई ठोस सबूत भी नहीं पेश कर पाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को आधार बनाते हुए फैसला सुनाया और अयोध्या में हिंदू पक्ष को राम मंदिर निर्माण का हक़ मिल गया है।

1528 को मीर बाक़ी द्रारा बनवाई गई बाबरी मस्जिद का विवाद 9 नंबर को अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच कर अब समाप्त होता दिख रहा है। सदियों से चले आ रहे इस मंदिर-मस्जिद विवाद को भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाकर ख़त्म किया। हिंदुओं के पक्ष में आए इस फ़ैसले के बाद देश भर के मुस्लमानों ने स्वीकार तो किया मगर अपने साथ भेदभाव का भी आरोप लगाया।

आख़िर बाबरी मस्जिद को लेकर भारत का मुस्लमान सालों तक क्यों लड़ता रहा ?

मीर बाक़ि द्वारा 1528 में बनवाई गई यह एक सामान्य सी मस्जिद थी। इस मस्जिद से मुस्लमानों के लिय ख़ास होने का बस एक मतलब था कि यह बेहद पुरानी थी। वहीं, हिंदुओं की आस्था की बात करें तो भगवान राम हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। जिस तरह मुस्लमान पैग़म्बर के प्रति अपनी आस्था रखते हैं उसी तरह हिंदू भी भगवान राम में आस्था रखते हैं। बाबरी मस्जिद का गिराया जाना ग़लत था मगर धार्मिक नज़रिए से मस्जिद बस इस लिय ख़ास थी कि बेहद पुरानी थी। इस्लाम की शिक्षा भी यही कहती है कि मुस्लमानों को बाबरी पर अपना दावा ख़ुद ही छोड़ देना चाहिए था।

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मगर बाबरी को लेकर मुस्लमानों ने दशकों तक हिंदू-मुस्लिम के बीच नफ़रत की दीवार ख़ड़ी कर रखी थी। अब इस मसले का अतं होता तो दिख रहा है। मगर क्या अब वो लोगों को वापस लाया जा सकता है जिनकों मज़हबी उन्माद के नाम पर मौत के मुहं में ढ़केल दिया गया। सैकड़ों परिवार उजड़ गए । हज़ारों लोगों ने अपनी जान गंवा दी।

वहीं दूसरी तरफ़ देखें तो मुस्लमानों ने ख़ुद ही 1925 में इस्लामी कैलेंडर के शव्वाल महीने की 8 तारीख़ को मुसलमानों के दूसरे सबसे पवित्र शहर मदीने में पैग़म्बरे इस्लाम (स) की बेटी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के पवित्र मज़ार समेत इस्लाम की कई विशिष्ट हस्तियों की क़ब्रों को ध्वस्त कर दिया था।

सऊदी शासन और कट्टरपंथी वहाबी समुदाय द्वारा अंजाम दी गई इस्लाम विरोधी इस दुःखद घटना के बाद से दुनिया भर के मुसलमान विशेष रूप से शिया मुसलमान 8 शव्वाल को शोक दिवस के रूप में मनाते हैं और विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करके आले सऊद शासन से हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के रौज़े के पुनर्निर्माण की मांग करते हैं। जन्नतुल बक़ी मदीना शहर का वह क़ब्रिस्तान है जिसमें पैग़म्बर स.अ. के रिश्तेदार, अहलेबैत अ.स., मोमेनीन की माएं, नेक असहाब, ताबेईन और दूसरे बहुत से अहम लोगों की क़ब्रें हैं कि जिन्हें 8 शव्वाल 1344 हिजरी को आले सऊद ने ढ़हा दिया था और अफ़सोस की बात यह है कि यह सब इस्लामी तालीमात के नाम पर किया गया।

बक़ी में दफ़्न शख़्सियतें

इतिहासकारों के अनुसार बक़ी वह ज़मीन है जिसमें पैग़म्बर स.अ. के बाद उनके बेहतरीन सहाबा दफ़्न हुए, साथ ही वहां पैग़म्बर स.अ. की बीवियां, उनके अहलेबैत अ.स., उनका बेटा इब्राहीम, उनके चचा अब्बास, उनकी फ़ुफ़ी सफ़िया बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब और बहुत से ताबेईन दफ़्न हैं, इतिहास के अनुसार धीरे धीरे बक़ी उन मज़ारों में से हो गया जहां हाजी हज करने और अल्लाह के घर की ज़ियारत करने के बाद उस क़ब्रिस्तान की ज़ियारत के लिए तड़पता था, हदीस में है कि पैग़म्बर स.अ. ने वहां की ज़ियारत करने और वहां दफ़्न होने वालों को सलाम और उनकी मग़फ़ेरत की दुआ की है।

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तीन नामों (बक़ी, बक़ीउल फ़ुरक़द, जन्नतुल बक़ी) से मशहूर इस क़ब्रिस्तान का इतिहास, इस्लाम से पहले से संबंधित है लेकिन तारीख़ी किताबें इस पर रौशनी डालने से मजबूर हैं, लेकिन इसके बावजूद जो सच्चाई है वह यह है कि बक़ी, हिजरत के बाद मदीना शहर के मुसलमानों के दफ़्न होने का इकलौता क़ब्रिस्तान था, मदीने के लोग मुसलमानों के आने से पहले अपने मुर्दों को बनी हराम और बनी सालिम नामी क़ब्रिस्तान में दफ़्न किया करते थे।

जन्नतुल बक़ी में 495 हिजरी में आलीशान गुंबद रौज़ा बना हुआ था, हेजाज़ में शरीफ़ मक्का के हारने के बाद मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब की पैरवी करने वालों ने मुक़द्दस हस्तियों की शख़्सियतों की क़ब्रें ढ़हा दीं जिसके बाद इस्लामी जगत में बेचैनी फैल गई, जब वहाबियों का मक्का और मदीना पर क़ब्ज़ा हो गया तो उन्होंने दीन का व्यापार करना शुरू कर दिया और वह इस तरह कि इस्लामी देशों से जो बड़े बड़े उलमा हज के लिए आते वह इन वहाबियों की तौहीद की दुकान से तौहीद ख़रीदते और उनकी फ़िक़्ह का सौदा मुफ़्त में अपने साथ वापस लेकर जाते थे।

वहाबियत के एजेंडों में से एक यह भी है कि दुनिया भर के विशेष कर इस्लामी देशों के धोखेबाज़ और बिकाऊ लेखकों के क़लम को रियाल और डॉलर के बदले ख़रीद लिया जाए, इसी तरह उन्होंने हज के मौक़े का फ़ायदा उठाया और दुनिया भर के मुसलमानों के साथ जितने भी बड़े बड़े नामवर उलमा आते हैं यह लोग उनसे संपर्क करते हैं और किसी न किसी तरह से उन्हें खरीद लेते हैं और उनके द्वारा अपनी विचारधारा को पूरी दुनिया में फैलाते हैं, जब उनका मुफ़्ती डॉलर और रियाल को देख कर अपना अक़ीदा बदलता है तो उसकी पैरवी करने वाले अपने आप अपना अक़ीदा बदल देते हैं, यही कारण है कि आज आले सऊद की विचारधारा तेज़ी से फैलती जा रही है।

अब्दुल्लाह इब्ने अब्दुल अज़ीज़ का किरदार

वहाबियत को ख़ुश करने के लिए अब्दुल्लाह ने मक्का जद्दा और मदीने से इस्लामी इतिहास से जुड़ी चीज़ों को मिटाने की ठान ली, मक्के में मौजूद हज़रत अब्दुल मुत्तलिब, हज़रत अबू तालिब, उम्मुल मोमेनीन हज़रत ख़दीजा अ.स. के साथ साथ पैग़म्बर स.अ. की विलादत की जगह और हज़रत ज़हरा स.अ. के रौज़े को भी गिरा दिया, बल्कि जितनी भी ज़ियारत की जगहें थीं सबके ढ़हा दिया और सब रौज़ों के गुंबद भी गिरा दिए, इसी तरह जब मदीना को घेरा तो हज़रत हमज़ा की मस्जिद और मदीने से बाहर उनकी क़ब्रों को ढ़हा दिया, अली वरदी का बयान है कि जन्नतुल बक़ी मदीना में पैग़म्बर स.अ. के दौर और उसके बाद क़ब्रिसतान था जहां पैग़म्बर स.अ. के चचा हज़रत अब्बास, हज़रत उस्मान, पैग़म्बर स.अ. की बीवियां, बहुत सारे सहाबा और ताबेईन के अलावा चार इमामों (इमाम हसन अ.स., इमाम सज्जाद अ.स., इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स., इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स.) की क़ब्रें थीं और इन चारों इमामों की क़ब्रों पर भी ईरान और इराक़ में बाक़ी इमामों की क़ब्रों की तरह ख़ूबसूरत ज़रीह मौजूद थी जिन्हें वहाबियों ने ढ़हा दिया।

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लेकिन हर अक़्लमंद इंसान को यह सोंचना चाहिए कि इसी सऊदी में आज भी ख़ैबर के क़िले के बचे हुए अंश वैसे ही मौजूद हैं और उसकी देख रेख भी होती है और दुनिया भर के यहूदी आ कर उसे देखते हैं जिससे साफ़ ज़ाहिर है कि आले सऊद का यहूदियों जो मुसलमानों के खुले हुए दुश्मन हैं उनसे कितने मधुर संबंध हैं। कौन नहीं जानता कि पूरी दुनिया में आज मुसलमानों का यही ज़ायोनी यहूदी क़त्लेआम कर रहे हैं उसके बावजूद यह वहाबी उनसे हर तरह के मामलात अंजाम दे रहे हैं, इसलिए उलमा की ज़िम्मेदारी है कि पूरी दुनिया के मुसलमानों का क़त्लेआम करने वाले ज़ायोनियों से आले सऊद की दोस्ती का पर्दा फ़ाश करते हुए उनकी मुनाफ़ेक़त को सबके लिए ज़ाहिर करें।

अफ़सोस कि 8 शव्वाल 1344 हिजरी में आले सऊद ने बनी उमय्या और बनी अब्बास के क़दम से क़दम से मिलाते हुए नबी स.अ. के पाक ख़ानदान की क़ब्रों को वीरान कर के उसे ख़डर में बदल दिया जिससे उनकी पैग़म्बर स.अ. और उनकी आल अ.स. से दुश्मनी, उनकी कट्टरत, क्रूरता और हिंसक स्वभाव ज़ाहिर हो चुका है।

ये लेखक के निजी विचार हैं..

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