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कानपुर: वे मंदिर जो बाबरी विध्वंस के बाद हुए दंगो की चपेट में आए और आज खंडहर में तब्दील हो गए : ग्राउंड रिपोर्ट

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फोटो- ग्राउंड रिपोर्ट

ग्राउंड रिपोर्ट | नेहाल रिज़वी

6 दिसंबर, साल 1992 हर तरफ़ आयोध्या में एक आवाज़ गूंज रही थी, “एक धक्का और दो, बाबरी तोड़ दो.”, अयोध्या का आसमान चीरते ये नारे, सैकड़ों साल पुरानी मस्जिद पर चोट करतीं कुदालों की ठक-ठक, और ऊंचे स्वर में जय श्री राम के नारों की आवाज़ के बीच हज़ारों कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ज़मीदोज़ कर दिया.

1992 के बाद से कानपुर में बंद पड़ा एक मंदिर.. फ़ोटो- ग्राउंड रिपोर्ट

सात दिसंबर 1992 को पूरा देश एक अजीब से गहरे सन्नाटे में डूब गया…जैसे तूफान से पहले की एक भयानक शांति. ऐसा लग रहा था मानो दो हिस्सों में बंट चुके समाज में इस ओर से लेकर उस ओर के आम लोग खुली आंखों से अगली अनहोनी का इंतज़ार कर रहे थे. अगली सुबह जो हुआ शायद इस देश नें कभी ऐसा नहीं सोचा होगा. देश दंगों की भयानक चपेट में आ गया जिसके चलते हज़ारों लोगों की जाने चली गई.

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से महज़ 80 किलोमीटर दूरी पर स्थित शहर कानपुर भी 6 दिसंबर की आग की लपटों से बच नहीं सका. कानपुर में भी दंगे भड़क उठे. शाम होते-होते शहर पूरी तरह से दंगों की भयानक चपेट में आ गया. पुलिस प्रशासन के लिय सबसे बड़ी चुनौती ये थी के वे जैसे ही किसी एक क्षेत्र में फैले दंगे को रोकने की कोशिश शुरू करते, वैसे ही शहर के किसी दूसरे क्षेत्र में उपद्रव शुरू हो जाता.

1992 से बंद मंदिर जिसको गिराने की कोशिश तो की गई मगर मज़बूत निर्माण के चलते असफल रहे… फ़ोटो- ग्राउंड रिपोर्ट

6 दिसंबर 1992 के कुछ चश्मदीदों से मैंने कानपुर शहर के उस वक़्त के हालात पर चर्चा की है. मुस्लिम बहुल्य क्षेत्रों में रहने वालें कुछ चश्मदीदों ने मुझे बताया कि, “शहर कानपुर के कुछ मुस्लिम बहुल्य क्षेत्रों में लोग काफ़ी आक्रोशित थे. धीरे-धीरे लोग बेहद आक्रोशित हो गए और पुलिस पर हमलावर हो गए . पुलिस के लिय सबसे बड़ी चुनौती थी इन मुस्लिम बहुल्य क्षेत्रों में फंसे हुए हिंदुओं को सकुशल बाहर निकालना. घनी बस्ती और तंग गलियों वाले इन इलाक़ों में पुलिस पूरी तरह से हालात पर काबू पाने में सफल नहीं हो पा रही थी.”

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दिलशाद नाम के व्यक्ति ने ( काल्पनिक नाम ) बताया जो उसी भीड़ का हिस्सा था. “हम लोगों ने इलाक़े में बने मंदिरों पर हमला करना शुरू कर दिया. मंदिरों को गिराने की भी कोशिश करने लगे, मगर मंदिरों का निर्माण बेहद मज़बूत था जिसके चलते हम लोग मंदिर को गिराने में असफ़ल रहे और इलाक़े में रहने वाले हिंदुओं के घर पर हमला कर दिया. हर तरफ़ लूटपाट और अफ़रा-तफरी का माहौल बना हुआ था. कुछ मुस्लिम लूटपाट और घरों पर हमला करने का विरोध कर रहे थे. मगर भीड़ बेकाबू हो चुकी थी. विरोध करने वाले मुस्लिमों को भीड़ ने पीट दिया था जिसके बाद वे लोग वहां से चले गए.”

दिलशाद आगे बताते हैं , “स्थिति तब और अधिक बिगड़ गई जब पुलिस की गोलियों से कुछ लोगों की मौत हो गई. 2 से 3 दिन चले इस उपद्रव को पुलिस ने शांत कर दिया. पुलिस पूरे क्षेत्र को काबू कर कर्फ्यू लगाने में कामयाब रही. मगर जो दर्द और मंज़र था वो बेहद डरावना था. इलाक़े में रहने वाले कुछ हिंदुओं को अपनी जान गंवाना पड़ी और कुछ निकलने में कामयाब रहे. मगर मकानों और कुछ मंदिरों पर लोग अवैध क़ब्ज़ा करने में कामयाब रहे. कुछ लोगों की पहले से एक सुनियोजित साज़िश थी के उन्हें घरों और मंदिरों पर क़ब्ज़ा करना है.”

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आज 27 साल बीत जाने के बाद भी मंदिरों और मकानों को दोबारा से वापस ले पाना मुमकिन न हो सका. पुलिस की मिली भगत से कुछ मंदिरों को तोड़कर लोगों ने उसको घर की शक्ल दे दी. तो कुछ में मार्केट बना डाला. मगर आज भी कुछ मकान और मंदिर खंडर की शक्ल में मौजूद हैं. मौजूदा 9 मंदिरों का ढांचा आज भी उसी अवस्था में खड़ा हुआ है. कुछ मकान आज भी मौजूद हैं जिन पर आज भी ताला लगा हुआ है.

1992 से बंद पड़े मंदिर को क्षेत्रिए लोगों ने एक प्याऊ में बदल दिया.. फ़ोटो- ग्राउंड रिपोर्ट

एक अनुमान के मुताबिक़ बचे हुए मकानों और संपत्तियों की कीमत 50 करोड़ के आस-पास आंकी जाती है. इलाक़े के कुछ मुस्लिमों ने एक मंदिर को ख़ोल कर उसकी साफ़ सफाई कराई और वहां पर एक प्याऊ की स्थापना कर दी. बचे हुए 5 से 7 मंदिर आज भी खंडहर की शक्ल में खड़े हुए हैं. बात को 27 वर्ष बीत चुके हैं, मगर आज भी इन क्षेत्रों में 1992 के तस्वीर नज़र आती है. अब इन क्षेत्रों में मंदिर तो हैं मगर उनकी पूजा करने वाले सब यहां से जा चुके हैं.

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धर्म और जात के नाम पर मचने वाले उन्माद हमेशा समाज को बांट दिया करते हैं और बटा हुआ समाज एक बेहतर राष्ट्र की स्थापना नहीं कर पाता है.

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