’16वीं सदी से पहले अयोध्या में नहीं मिलता राम की पूजा का कोई प्रमाण’

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Ground Report | Nehal Rizwi

  • 16वीं सदी से पहले राम जी की पूजा का कोई प्रमाण इस अयोध्या में नहीं मिलता है
  • रामायण के अनुसार रावण के स्थान से अयोध्या जितनी दूर होनी चाहिए, नहीं है
  • थॉमस रॉबर्ट ने अपनी किताब में अयोध्या का ज़िक्र उड़ीसा में किया है
  • रामायण के अनुसार अयोध्या या राम का जन्म स्थान वर्तमान अयोध्या में नहीं है
  • रामायण में अयोध्या के कई हज़ार साल पहले से होने का ज़िक्र है लेकिन ये अयोध्या इल्तुतमिश में समय में परगना बनाया गया था

नई दिल्ली। आल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत के दिल्ली स्थित मुख्यालय में अयोध्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से सम्बंधित शोध पर आधारित एक किताब का विमोचन किया गया. इस अवसर पर किताब के लेखक डॉ० अब्दुर्रशीद अगवान, मुख्य अतिथि रवि नायर, मुशावरत के राष्ट्रीय अध्यक्ष नावेद हामिद, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफ़ेसर मोहम्मद रफ़अत और जमाअत इस्लामी के राष्ट्रीय सचिव नुसरत अली भी मौजूद थे.

डॉक्टर अब्दुर्रशीद अगवान ने अपनी किताब, ‘क्लिंचिंग एविडेंस ऑन अयोध्या’ के बारे में विस्तार पूर्वक बताया और इस पर चर्चा की. उन्होंने बताया कि ये किताब शोध पर आधारित है जिसमें भौगोलिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, धार्मिक और  दुसरे अन्य साक्ष्यों से ये बताने की कोशिश की गयी है कि अयोध्या जिसका वर्णन रामायण में है वो ये नहीं है जहाँ राम जी के पैदा होने का दावा किया जाता रहा है. इस किताब में 17 प्रमाण देकर ये साबित करने की कोशिश की है कि रामायण में जिस अयोध्या का वर्णन है वो ये नहीं है जिसके ज़मीन की लड़ाई वर्षों से कोर्ट में जारी है.

रवि नायर ने अपने संबोधन में किताब और उसके लिए किए गए शोध की सराहना करते हुए कहा कि लेखक के प्रयास काबिले तारीफ है लेकिन कोर्ट की लड़ाई ऐतिहासित साक्ष्य से तो लड़ी जा सकती है मगर किसी काल्पनिक कहानी से नहीं. उन्होंने कहा कि सैकड़ों रामायण लिखी गयी है ऐसे में आप किस रामायण को मानेंगे? हर रामायण की कथा अलग-अलग है इसलिए कोर्ट को साक्ष्य प्रस्तुत करना होता है केवल एतिहासिक शोध काफ़ी नहीं होते.

रवि नायर ने कहा कि अगर आप अयोध्या की लड़ाई जीतना चाहते हैं तो आप को राजनीतिक और कानूनी लड़ाई लड़ना होगा न की धार्मिक. “दिस इज़ सिविल डिस्प्यूट, नॉट हिस्टोरिकल फाइट.” बाबरी का मुद्दा कोई मुसलमानों की लड़ाई नहीं है बल्कि ये लोकतंत्र की लड़ाई है.

कार्यक्रम के अंत में प्रोफ़ेसर डॉक्टर मोहम्मद रफ़अत ने कहा कि जब सरकार देश के इतिहास को बदलने लगे तो ऐसे में ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाने की आवश्यकता है जैसा की अब्दुर्रशीद अगवान साहब ने किया है. जहाँ तक कानूनी लड़ाई का सम्बन्ध है तो मामला न्यायालय में विचाराधीन है और हम सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को मानेंगे. मगर जिस देश में इतिहास झूठा पढ़ाया जाता हो, जहाँ बुनियाद झूठ पर आधारित हो वहां ऐतिहासिक साक्ष्यों को सामने लाना समय की बड़ी आवश्यकता है.