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पुलिसकर्मियों पर बढ़ते हमले सरकार के प्रति बढ़ते अविश्वास का परिणाम है

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चिकित्सकों ,पुलिसकर्मियों पर हमला गंभीर विषय है, कारवाई होनी चाहिए। पर इन सब के बीच कई बडे प्रश्न भी है जैसे कि हमले क्यों हो रहे है? हमले के पीछे कारण क्या है? सामान्यतः समाज में पुलिस की छवि नकारात्मक होती है। लाकडाउन में अनेकों ऐसी तस्वीरें, वीडियोज सामने आई है जो पुलिस के दमनकारी चरित्र को उजागर करती हैं पर इसके साथ-साथ पुलिस की अनेकों ऐसी तस्वीरें भी आई है जो प्रशंसनीय है।

पुलिस एवं जनता के मैत्री संबंधो को उजागर करती है। परन्तु चिकित्सकों के संबंध में समाज एक हद तक सदैव सकारात्मक रहा है। ऐसे में चिकित्सक एवं पुलिस की टीम पर हमले कइ प्रश्न खडे कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो हमले के पीछे अफवाहें काम कर रही हैं, कहीं पर एनपीआर का भय सामने आ रहा तो कहीं पर वर्ग विशेष के लोगों को क्वारंटीन किये जाने का भय है।

इन सब से जो बातें निकल कर आती है वह अपनी सरकार के प्रति कही ना कहीं अविश्वास को दर्शाती है जो कि गंभीर है और कहीं ना कहीं जायज भी। कोरोना के विकट काल में जबकि सरकारों को सर्वाधिक चिकित्सा सेवा पर केंद्रित होना चाहिए था, सरकार अपने राजनीतिक शत्रुओं को ठिकाने लगाने का काम कर रही है। दिल्ली से ऐसी कई सूचना है कि सरकार एनआरसी के विरोध में शामिल युवाओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को जांच के नाम पर बुला कर गिरफ्तार कर रही है।

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संभवतः सरकार के लिए अपने शत्रुओं से निपटने के लिए यह स्वर्णिम काल है। कोर्ट कचहरी ,विधिक उपचार की सभी संभावनाओं पर लगभग कोरोना प्रभाव है। ऐसे में सरकार अपने राजनीतिक शत्रुओं के होश ठिकाने लगाने में कोई कसर नही छोडना चाहती। वहीं सरकार की कार्रवाई से उपजे अविश्वास के कारण आम नागरिकों में किसी भी प्रकार की अफवाह पैठ बना ले रही हैं। परिणामस्वरुप हमले सामने आ रहे हैं।

सरकार के लिए यह बडी चुनौती है की हर विषय पर आम नागरिकों, अल्पसंख्यकों, दलितों सामाजिक कार्यकर्ताओं से अपनी खोई हुई स्वीकार्यता को बहाल करे। अविश्वास की खाई पाटे और विश्वास की भावना को बहाल करे। आम नागरिक जब सरकार से नाराज होता है तो मुर्दाबाद के नारे लगाता है। पर जब सरकार से भयभीत हो जाता है तो यह अंतर करने में भी असमर्थ हो जाता है की सरकार का विरोध करते करते कब राष्ट्र विरोधी हो गया। सरकार को इस दिशा में पहल करना चाहिए।

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विश्वास की परंपरा बहाल होनी चाहिए। सरकार से नाराजगी एवं भय में सूक्ष्म अंतर होता है पर इसका दुष्परिणाम भयंकर होता है जो नागरिक सरकार एवं देश तीनों के लिये घातक होता है। इन विषम परिस्थिति में नागरिक अपने राष्ट्रीय दायित्व को समझें। सरकार अपने दायित्व को समझते हुए असंतुष्ट एवम भयभीत नागरिकों में विश्वास की परंपरा जाग्रत करें। घर में रहें सुरक्षित रहें।

एडवोकेट कफील आज़मी

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