राजीव की वजह से जिंदा हैं अटल, इन्दिरा को बताया था ‘दुर्गा’, कुछ ऐसे थे नेहरू से रिश्तें

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रिपोर्ट- कार्तिक सागर समाधिया।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ। लौटकर आऊँगा,कूच से क्यों डरूँ? ये पंक्तियां देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता की है। एक ऐसा व्यक्तित्व या यूं कहें राजनीति का दमकता दिवाकर जो धीरे धीरे अस्त होने की कगार पर है। अपने मानवीय मूल्यों से धुर्व तारों की पंक्तियों में विराजित होने को आतुर।

मौत से ठान लेना और अपराजित लड़ाई का योद्धा। नेहरू से लेकर इंदिरा के उतार चढ़ाव की राजनीति में अपने तेज की आभा लिए। विश्वमंच पर अग्रिम पंक्ति का भारतीय सेनापति। आज जिस वक्त यह पोस्ट लिखी जा रही है उस वक़्त अटल जीने मरने की राह में उलझे हुए हैं।वक़्ता।

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नेहरू का चहेता भारत को परमाणु की सौगात देकर विश्व भर के देशों से लड़ने की ताकत देने वाला। खुद में एक राजनीति का विद्यालय। स्कूल ऑफ अटल पॉलिटिक्स। हालांकि आपको बताते चले आज हम बात कर रहे हैं गांधी- नेहरू परिवार की पीढ़ी दर पीढ़ी से रहे रिश्तों के बारे में….

बात अगर वैचारिक स्तर की हो जाये तो अटल और कांग्रेस दो अलग धुरी रहे। लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर सहज भाव रहा। बात 1987 की है जब अटल बिहारी वाजपेयी किडनी की परेशानी से जूझ रहे थे। उस वक़्त उनकी इस बीमारी का इलाज अमेरिका में ही संभव था। लेकिन आर्थिक तंगियों के बीच वह अमेरिका नहीं जा रहे थे।

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इस दौरान उनकी मदद के लिए आगे आये तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी। उन्‍होंने अपने दफ्तर में वाजपेयी को बुलाया और उसके बाद कहा कि वे उन्‍हें संयुक्‍त राष्‍ट्र में न्‍यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं। वे इस मौके का लाभ उठाकर वहां अपना इलाज भी करा सकेंगे। इतिहासकारों के मुताबिक, राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी से कहा था कि मुझे उम्मीद है कि आप अपना पूरा इलाज करवाकर स्वस्थ होकर भारत लौटेंगे।

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इस घटना का जिक्र मशहूर पत्रकार करण थापर ने अपनी एक किताब में किया है। उन्होंने लिखा है, 1991 में राजीव गांधी की हत्‍या के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उनको याद करते हुए इस बात को पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा ”मैं न्‍यूयॉर्क गया और इस वजह से आज जिंदा हूं।”

न्यूयॉर्क से लौटने के बाद कभी भी राजीव और अटल ने इस बात का जिक्र नहीं किया। लेकिन बताया जाता है कि अटल जी ने पोस्टकार्ड भेजकर राजीव गांधी का आभार प्रकट किया था।

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इंदिरा गांधी द्वारा की गई 1971 में पाकिस्तान पर करवाई के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें ‘दुर्गा’ कहकर संबोधित किया था। उस दौरान अटल सदन में विपक्ष के नेता थे। उस युद्ध में बांग्‍लादेश बना था और पाकिस्‍तान के 93 हजार सैनिकों को भारतीय सेना ने बंधक बनाया।

हांलाकि बाद में इंडिया टीवी के शो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम आपकी अदालत में पत्रकार रजत शर्मा द्वारा पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बात का खंडन करते हुए कहा था कि मैंने उन्हें दुर्गा नहीं बताया था। मैंने अगले ही दिन इस खबर का खंडन कर दिया था लेकिन अखबारों में इस बात एक छोटे से कोने में जगह दी गई थी।

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अगर उनके नेहरू से रिश्ते की बात की जाए तो कहा जाता है कि नेहरू उनकी भाषण शैली के बड़े कायल थे। 1957 में बलराम सीट से जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे थे। कहा जाता है कि लास्ट बेंच पर बैठने वाले इस नेता के भाषण को प्रधानमंत्री बहुत गंभीरता से सुनते थे। नेहरू की मृत्यु के बाद अटल जी ने उनपर एक मार्मिक कविता भी लिखी थी।

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बताया जाता है कि एक बार जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री भारत की यात्रा पर आए तो पंडित नेहरू ने वाजपेयी से उनकी मुलाकात कराते हुए कहा था कि “इनसे मिलिए। ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं। मेरी हमेशा आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूं।” ऐसी एक बार किसी मुलाकात में नेहरू ने अटल बिहारी वाजपेयी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में भो विदेशी नेताओं से मिलवाया था।

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