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अटल बिहारी वाजपेयी: टूटकर एक और तारा आसमान में जुड़ गया

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लेखक- आशीष विश्वकर्मा

क्या हार में, क्या जीत में, किंचित नही भयभीत में।
कर्त्तव्य पथ पर जो मिला, यह भी सही वो भी सही।

चीन हो या पकिस्तान, पक्ष हो या विपक्ष कभी किसी से न हारने वाला प्रधानमंत्री आज मौत से हार गया। टूटकर एक और तारा आसमान में जुड़ गया। सूरज हमेशा के लिए डूब गया। जननेता, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अब नही रहे। यह अंत है… राजनीति के एक युग का सूरज हमेशा के लिए डूब गया।

विपक्ष का प्यार, और संसद की ऐसी मर्यादा अब शायद ही देखने को मिले। जहाँ एक विपक्ष के नेता को अपना प्रतिनिधि बनाकर विदेश भेज दिया जाये। अब शायद ही ऐसा हो जब आमजन की पीड़ा कविताओं का रूप लेकर संसद के गलियारों में गूँज रही हो।

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1957 में बलरामपुर से सांसद बनकर अटल बिहारी वाजपेयी संसद पहुँचे। जब अटल बोलते तो संसद मौन हो जाता, तब वाजपेयी की आवाज गूँजकर यह कह रही होती है कि देश से बढ़कर कुछ नही। पाँच दशकों तक संसद में अपने भाषणों से देश की जनता की आवाज को बुलंद करते रहे। 1996 में देश के दसवे प्रधानमंत्री बने। 1 वोट से हारने के कारण सिर्फ 13 दिन सरकार चली।

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1998 में पुनः देश के प्रधानमंत्री बने और 2004 तक भारत को सेवा की। पोखरण परमाणु कार्यक्रम हो या कारगिल, उन्होंने कभी देश की सुरक्षा से समझौता नही किया। अपने परिवार को आगे नही बढ़ाया उन्होंने देश को परिवार मानकर अपना सर्वस्व देश के लिए न्यौछावर कर दिया।

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तनपर पहरा भटक रहा मन, साथी है केवल सूनापन। बिछुड़ गया क्या स्वजन किसी का, क्रंदन सदा करुण होता है। दूर कही कोई रोता है। आपको भावपूर्ण श्रद्धांजलि आप हमेशा भारतवासियों के दिलों में ज़िंदा रहेंगे।

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