‘भक्तों के भगवान’ को अटल की लोकप्रियता से डर था

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लेखक- सचिन शेखर झा

एक राजनेता अगर लोगों से मिल नहीं सकता, किसी मुद्दे पर बयान नहीं दे सकता तो वो उसके लिए मौत से कम नहीं है। ‘अटल युग’ को दो चरण में रखकर देखा जा सकता है। एक जब वो विपक्ष में होते थे और उनकी पहचान RSS केडर के रूप में अधिक होती थी। दूसरा 1996 से 2004 तक। इस दौरान उन्होंने करीब 6 साल तक बतौर प्रधानमंत्री के रूप में देश की सेवा की। इस दौर में अटल शायद पुराने ‘जमीन समतल’ करने वाले अटल से अलग अटल थे। कई ऐसे मौके आए जब अटल ने संघ की नहीं सुनी जोर्ज को रक्षा मंत्री बनाना हो या अयोध्या मुद्दा। अटल अपनी छवि को बचाने के लिये अटल ही रहे। संघ के साथ अटल का रिश्ता तब और भी अधिक खराब हो गया जब बीजेपी के महासचिव और संघ के विचार मंडल के सदस्य गोविंदाचार्य को पार्टी कार्यालय तक से अपमानित कर के निकाल दिया गया।

गुजरात दंगे के बाद संघ और अटल के बीच और भी ठन गयी, वाजपेयी ने तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री को राजधर्म के पालन का आदेश दिया जो आरएसएस शायद नहीं पचा पा रही थी। 2004 तक अटल के प्रधानमंत्री रहते संघ की एक न चली लेकिन दुनिया के सबसे बड़े संगठन ने चुनाव में इसका बदला उनसे सूद समेत वसूल किया। झारखंड जैसे राज्य में जहां संघ की अच्छी पकड़ समझी है जाती है, जिसका निर्माण वाजपेयी ने ही करवाया था वहां बीजेपी 14 में से 13 सीट हार गई। बीजेपी के लिए यह इतिहास और अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था।

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2004 के चुनाव के बाद बीजेपी के भीतर सत्ता संघर्ष की शुरूआत हो गई। संघ और अटल आडवाणी गुट में जमकर टकराव के हालत हुए। इस दौरान अटल-आडवाणी का गुट कमजोर होता चला गया, चूंकि लाल कृष्ण आडवाणी में भी सत्ता के केंद्र में जाने की इच्छा बढ़ती जा रही थी। 2005 में जिन्ना की मजार पर जाकर आडवाणी की चादर चढाने के बाद तो संघ को जैसे मौका मिल गया बीजेपी को पूर्ण कब्जाने का। आनन फानन में आडवाणी को अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा।

RSS के चहेते राजनाथ सिंह जो की अटल के कार्यकाल में सड़क परिवहण मंत्री थे को अध्यक्ष बनाया गया। 2006 में ही अटल के हनुमान माने जाने वाले प्रमोद महाजन की संदेहास्पद हत्या के बाद बीजेपी में अटल युग को मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया गया। निश्चित रूप से अटल आंशिक रूप से समावेशी सोच थे।

2009 में हुए लोकसभा चुनाव में आडवाणी को संघ का वैसा सहयोग नहीं मिला जिसकी वो उम्मीद करते रहे हैं। चुनाव के समय ही BJP के तत्कलिन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कह दिया ‘दुल्हा तो मैं ही बनूंगा’। चुनाव में आडवाणी की हार हुई। पार्टी पर संघ की पकड़ पहले से कई गुना मजबूत हो गई। मोहन भागवत के करीबी महाराष्ट्र सरकार में एक अदने से मंत्री रहे नीतिन गडकरी को पार्टी का मुखौटा अध्यक्ष बनाया गया। बीजेपी के ऊपर एक ‘लंपट गिरोह’ का कब्जा हो गया जिसने पहले सोशल मीडिया को और फिर मेन स्ट्रीम मीडिया को मैनेज कर राजनीति करनी शुरू कर दी।

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2006 के बाद पिछले 12 वर्षों में देश के 12 पत्रकारों ने भी पूर्व प्रधानमंत्री और लोगों के दिलों पर राज करने वाले जननेता अटल बिहारी वाजपेयी को नहीं पूछा। उनके जन्मदिन को छोड़कर कभी किसी TV प्रोग्राम में उनको नहीं दिखाया गया। कारण बस एक ही था ‘भक्तों के भगवान’ को अटल की लोकप्रियता से डर था। बीते 12 वर्षों में संघ और ‘मोदी की बीजेपी’ ने हर वो काम किया जिससे अटल को लोग भूल जाए।

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अटल के प्रतिद्वंद्वी रहे दीनदयाल का महिमामंडन किया गया। अटल की सरकार गिराने वाले सुब्रह्मण्यम स्वामी को सम्मान दिया गया। पूरे देश में ऐसे लोगों को पार्टी में लाया गया जो अटल के विरोधी थे। जगदंबिका पाल से लेकर गिरधर गमांग तक इसके उदाहरण हैं। जो अटल के करीब थे फिर चाहे वो पूर्व वीएचपी अध्यक्ष और वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय हिन्दू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ही क्यों न हो किनारे कर दिये गये।

सबसे खास और अहम बात यह है कि इतनी मजबूत आईटी सेल वाली पार्टी के पास अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का एक पेज तक नहीं है। उनके भाषण के एक एक अंश को याद रखने वाली भारतीय जनता में 98 फीसदी आबादी को उनकी मौत से पहले तक यह भी नहीं पता था की उन्हें कौन सी बिमारी है। सोशल मीडिया में अटल के चर्चे भी कभी नहीं होते।

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अमूमन बीजेपी के किसी भी बड़े मुद्दों पर मीडिया को संबोधित करने संघ से बीजेपी में आए राम माधव आते हैं लेकिन इस दौरान सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि उनके निधन के पहले और उसके बाद तक हुए कार्यक्रमों से वो लगभग दूर ही रहे। संघ की और से मोहन भागवत को छोड़ कोई अन्य नेता सामने नहीं आया। अंतिम संस्कार के मौके पर भी संघ और बीजेपी से जुड़े कोई संत नहीं दिखे यहां तक की हर मुद्दे पर बीजेपी के साथ खड़े रहने वाले बाबा रामदेव और श्री श्री भी कहीं नजर नहीं आए।

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लेकिन 12 वर्ष तक मीडिया से दूर रहने के बावजूद भी वाजपेयी की लोकप्रियता कम नहीं हुई। उनकी मौत पर लाखों लोग जुटे। देश के हिंदी पट्टी के टियर 1 और टियर 2 शहर में दुकानें कम खुली। आम लोगों में एक श्रद्धा का भाव दिखा। हलांकी बात-बात पर 5 लाख की भीड़ जुटा कर सभा करने वाली ‘मोदी की बीजेपी’ ने शव यात्रा को अन्नादुरई और बाल ठाकरे की शव यात्रा की तरह यादगार बनाने का कोई प्रयास नहीं किया।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अंतिम यात्रा में एक ‘अनुशासित भीड़’ पहुंची। यह संकेत है ‘मोदी एंड कंपनी’ के लिए की आप के गलत प्रयासों से किसी की हस्ती नहीं मिट सकती है। उन्मादी भीड़ की राजनीति बहुत दिनों तक नहीं कर सकते हैं। नेहरू, इंदिरा, अटल, राजीव, वीपी सिंह और मनमोहन सिंह जैसे दिग्गज नेताओं को जनता याद करती है और याद करती रहेगी। प्रचार तंत्र को कब्जे में लेकर राजनीति की जा सकती है लेकिन वो टिकाऊ नहीं हो सकती।

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