एक छात्र नेता से ‘वित्तमंत्री’ तक, जानिए- कैसा था जेटली का राजनीतिक सफ़र

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

नई दिल्ली: काफ़ी समय से बीमार चल रहे भाजपा के राज्यसभा सांसद और पूर्व वित्तमंत्री अरुण जेटली का 67 साल की उम्र में दिल्ली के एम्स में शनिवार की दोपहर को निधन हो गया. करीब एक साल से लगातार बीमारी के चलते विदेश भी इलाज के लिय जा चुके थे. बीते 9 अगस्त को हालत ज़यादा ख़राब होने के चलते उनको एम्स में भर्ती कराया गया था. एम्स में भी उनकी हालत दिन प्रति-दिन बिगड़ती ही जा रही थी और शनिवार दोपहर उन्होने एम्स में अंतिम सांस ली.

अरुण जेटली के देहांत की ख़बर सुनते ही बीजेपी तमाम बड़े नेताओं सहित प्रधानमंत्री मोदी, गृहमत्री अमित शाह और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने ट्वीट करते हुए अपनी-अपनी सवेंदनाएं प्रकट की.  बीजेपी के सभी बड़े नेता अपने-अपने कार्यक्रमों को रद्द करके दिल्ली पहुंच रहे हैं. प्रधांमंत्री मोदी विदेश यात्रा पर हैं. अरुण जेटली के बेटे ने कहा कि मोदी देश के लिय बाहर गए हैं उनको अपना दौरा छोड़कर नहीं आना चाहिए.

जेटली की शुरूआती शिक्षा और जीवन

28 दिसंबर, 1952 को दिल्ली में जन्में अरुण जेटली ने अपनी शुरूआती शिक्षा दिल्ली के सेंट जेवियर्स स्कूल से प्राप्त की और उसके बाद श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से स्नातक की शिक्षा पूरी की. स्नातक की शिक्षा पूरी होते ही जेटली ने भी अपने पिता की तरह वकील बनने की ठानी और डीयू से 1977 में लॉ की डिग्री हासिल करते हुए एक शानदार वकील बने.

जेटली ने 24 मई 1982 को संगीता जेटली से विवाह किया जिससे उनके दो बच्चे, पुत्र रोहन और पुत्री सोनाली हैं. संगीता जेटली के पिता गिरधारी लाल डोगरा जम्मू-कश्मीर के राजनीति के दिग्गज नेताओं में थे, वे 80 के दशक में जम्मू-कश्मीर सरकार में वित्तमंत्री भी रहे थे.

छात्र राजनीति से वित्तमंत्री तक

पढ़ाई के साथ-साथ उनका झुकाव राजनीति की तरफ भी तेज़ी होने लगा. अरुण जेटली ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़कर छात्र राजनीति की शुरूआत की और 1974 में डीयू स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष बन गए. (1975-1977) के दौरान जेटली को मीसा के तहत 19 महीना जेल में भी काटा. यहीं से उनकी पहचान बनने की शुरूआत हो चुकी थी. उनसे प्रभावित होकर जय प्रकाश नारायण ने उन्हें राष्ट्रीय छात्र और युवा संगठन समिति का संयोजक नियुक्त किया. अटल सरकार में भी रहे मंत्री रहे अरुण जेटली इमरजेंसी के बाद जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी से जुड़कर अपनी राजनीति को नई उड़ान दी.

वकालत की पढ़ाई का राजनीति में भऱपूर लाभ मिला

1991 में अरुण जेटली बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बनें.1999 के लोकसभा चुनाव के समय वो भाजपा के प्रवक्ता बने. वाजपेयी सरकार में पहले वो सूचना प्रसारण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और बाद में अच्छी वकालत का फायदा मिला और 2000 में उन्हें कानून, न्याय और कंपनी मामले का कैबिनेट मंत्री चुना गया.

अरुण जेटली देश के सबसे महंगे वकीलों में गिना जाता रहा. 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने उनको संगठन में जगह देते हुए महासचिव बनाया. 2009 में जेटली को भाजपा ने राज्यसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया. 2014 के चुनावों में जेटली अमृतसर सीट से लोकसभा चुनाव हार गए लेकिन नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में वित्त जैसा अहम मंत्रालय सौंप दिया बतौर जिसके बाद वह भारत के वित्तमंत्री के रूप में कार्यभार संभालते रहे.

एक भी चुनाव नहीं जीता और दिग्गज नेताओं में रही गिनती

16वीं लोकसभा बनने के बाद अरुण जेटली को रक्षा मंत्रालय का भी कार्यभार अस्थायी रूप से सौंपा गया था. जेटली को हमेशा कहा जाता था कि चुनाव जीते या ना जीते ये हमेशा कैबिनेट में रहते हैं, बाजपेयी से लेकर मोदी तक वो सबके करीबी रहे. चुनाव हारने के बाद भी उनका क़द कम नहीं होता था. वो चार बार राज्यसभा सांसद बने थे. अरुण जेटली ने 1980 से बीजेपी में सक्रिय होने के बावजूद सन 2014 तक कभी कोई सीधा चुनाव नहीं लड़ा.

एक दुर्लभ प्रकार के ‘सॉफ़्ट टिशू सर्कोमा’ कैंसर ने ले ली जेटली की जान.

इस प्रकार का कैंसर मांसपेशियों, ऊतकों (टिशू), तंत्रिकाओं और जोड़ों में इतना धीरे धीरे फैलता है कि इसका पता लग पाना बहुत मुश्किल होता है. कैंसर जैसी घातक बीमारी का इलाज करने वाले कुछ डॉक्टरों का कहना है कि शरीर में बहुत से नान कैंसरस ट्यूमर होते हैं और इसीलिए इनका बाकी हिस्से में प्रसार नहीं होता और ना ही वे घातक होते हैं. धीरे-धीरे इनका रूप घातक होता चला जाता है.

भाजपा ने सुषमा स्वराज के बाद एक और दिग्गज नेता को खो दिया. अरुण जेटली का भाजपा में खासा बड़ा क़द रहा है. पार्लियामेंट में उनके भाषण भी काफ़ी प्रभावशाली होते थे. बीमारी से एक लंबी जंग लड़ने के बाद आख़िर कार जेटली ने दुनिया को अलविदा कह दिया.