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Anti-conversion laws for minorities: धर्म परिवर्तन विरोधी कानून अल्पसंख्यकों के लिए क्यों बना परेशानी का विषय?

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Anti-conversion law: आज भी कई भारतीय राज्यों के लिए धर्म परिवर्तन विरोधी कानून(Anti-conversion law) हमेशा जाँच का मुद्दा रहा है। जबकि सभी राज्यों में जबदस्ती धर्म बदलवाने पर सरकार ने रोक लगा दी है। जिनमें से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में शादी के जरिये हो रहे धर्म परिवर्तन पर कड़े कानून(Anti-conversion law) बनाए गए हैं। इसके साथ नए कानूनों में मुख्य अंतर यह है कि वे केवल विवाह के उद्देश्य से ही धर्म परिवर्तन को अपराध घोषित करना चाहते हैं।

क्या है चिंता का विषय?

दरअसल लोग केवल विवाह के उद्देश्य से ही धर्म परिवर्तन को अपराध घोषित करना चाहते हैं। धर्म परिवर्तन एक समस्या तब बन जाती है, जब इन कानूनों का गलत प्रयोग सांप्रदायिकता फैलाने और लोगों को, सबसे ज्यादा अल्पसंख्यकों(minorities) और समाज में सारी सुविधाओं से वंचित रहने वाले लोगों को टारगेट करने के लिए किया जाता है।

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राजनीतिक नीतियों की स्थापना के लिए बनाया यह कानून

एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में, धार्मिक अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों को रोक गया। जिससे भारत में धर्म के नाम पर आजादी की स्थिति में तेज गिरावट हुई। बता दें कि मई में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के चुनाव के बाद राष्ट्रीय सरकार ने अपने मजबूत संसदीय बहुमत का इस्तेमाल करके राष्ट्रीय स्तर की नीतियों को बनाए रखने के लिए यह कानून बनाया। जिसने पूरे भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन किया। जिसमे खासकर मुसलमानों शामिल थे।

इसके अलावा राष्ट्रीय सरकार ने अल्पसंख्यकों और उनके पूजा स्थलों के खिलाफ हिंसा जारी रखने की अनुमति भी दे दी। साथ ही अभद्र भाषा और लड़ाई- दंगों में शामिल हुए। 2021 में, USCIRF ने एक बार फिर भारत को CPC नामित करने को कहा, क्योंकि 2020 की साल भर की रिपोर्ट में जिन मुद्दों को रखा गया उनमें से कई लगातार बढ़ते ही रहे हैं।

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USCIRF ने हाइलाइट की कुछ नीतियाँ

यूएससीआईआरएफ के मुताबिक “भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार ने हिंदू राष्ट्रवादी नीतियों को बढ़ाया है। इस बढ़ावे के कारण धर्म की आजादी सही ढंग से नहीं मिल पाई और लगातार इसका उल्लंघन हित आ रहा है।” USCIRF ने हाइलाइट की कई नीतियों के तहत भारत की मुस्लिम आबादी का इलाज केंद्रित हैं। इसमें बहस करके वाला नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) का पारित होना है। जिसमें बाद में होने वाली धार्मिक हिंसा शामिल थी।

छह पुरुषों, दो महिलाओं और ईसाईयों पर लगा जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप

दरअसल मई 2018 में मध्य प्रदेश के एक रेलवे स्टेशन पर छह पुरुषों और दो महिलाओं के साथ आठ ईसाइयों को गिरफ्तार किया गया था। उन पर अपहरण का आरोप लगाया गया था और गर्मी में लगने वाले बाइबिल शिविर में उनके साथ 60 बच्चों को जबरदस्ती धर्म परिवर्तन का प्रयास किया गया था। बता दें कि सभी बच्चे ईसाई परिवारों से आए थे। साथ ही, उनके माता-पिता ने अपने बच्चों को शिविर में भाग लेने के लिए अपनी सहमति दी थी। इन तथ्यों के बावजूद, राज्य के धर्म परिवर्तन विरोधी कानून धर्म(Anti-conversion law) की स्वतंत्रता अधिनियम 1968 के तहत आठ ईसाइयों पर जबरन धर्मांतरण के प्रयास का आरोप लगाया गया था।

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आईसीसी ने कहा अमेरिका को करना होगा मोटिवेट

आईसीसी ने बताया कि अमेरिका को धार्मिक रूप से प्रेरित अल्पसंख्यक ईर्ष्या अपराधों के अपराधियों को सजा देने के लिए स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सरकारों के लिए मोटिवेट करना चाहिए। इन प्रोत्साहन में धार्मिक तरह से प्रेरित होने वाले  हमलों को रोकने के लिए भारतीय अधिकारियों को कार्रवाई करनी होगी। जो पुरस्कार-आधारित प्रणाली शामिल होनी चाहिए।

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मानवाधिकारों पर अध्ययन करने वाले समूह ने क्या कहा

दुनिया भर के ईसाइयों के मानवाधिकारों का अध्ययन करने वाले समूह “इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न” ने भारत में धर्म परिवर्तन विरोधी कानूनों की कमियों को उजागर करते हुए एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक कानून भारतीयों के धर्म की आजादी पर हमला करते हैं, और न चाहने वाले सरकारी हस्तक्षेप से उनके अधिकारों पर अंकुश लगाते हैं।

आईसीसी समूह ने सुझाव दिया कि अमेरिकी विदेश विभाग को अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए और भारत पर अपनी द्विपक्षीय वार्ता में धर्मांतरण विरोधी कानूनों को हटा देना चाहिए। साथ ही धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की निंदा करने का दबाव बनाना चाहिए।

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