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खुद को नंगा देखना किसे पसंद होगा?- अनिल गलगली RTI एक्टिविस्ट

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एम.एस.नौला । मुम्बई ।

RTI कानून में संशोधन पर हमने विस्तार से बात की RTI एक्टिविस्ट अनिल गलगली से..

आरटीआई कानून में संशोधन के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाए जा रहे हैं….

सरकार की मंशा पर सवाल बिल्कुल जायज है…यह सरकार की एक सोची-समझी चाल का आगाज है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी एनडीए सरकार आरटीआई कानून की धार को खत्म कर उसे विकलांग बनाना चाहती है। यही वजह है कि हाल ही में आरटीआई कानून में बदलाव के जरिए संशोधन कर केंद्र सरकार इस स्वायत्त संस्थान को अपने अधिकार में लेना चाहती है। जिस तरह आम लोगों से लेकर सांसदों को भी अंधेरे में रखकर सरकार ने आननफानन में आरटीआई कानून को संशोधित किया है उससे उसने खुद ही को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार के इस कदम से आम लोगों से लेकर सांसद, सूचना आयुक्त और आरटीआई एक्टिविस्ट सभी नाखुश हैं असहमत हैं।

तो इस वज़ह के चलते कह सकते हैं कि सरकार की सोच में खोट है…

एनडीए सरकार की मंशा सचमुच में वैध होती तो इसे पटल पर लाने के पहले कुछ नियम और प्रक्रिया का अवलंबन अवश्य कर सकते थे। दुर्भाग्य से यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार ने न सांसदों की परवाह की और न ही जनता की। आननफानन में यह विधेयक सीधे लोकसभा के पटल पर रखा गया। जबकि इस तरह का विधेयक लोकसभा के पटल पर रखने के पहले सांसद न्यूनतम दो दिन पहले उस विधेयक का मसौदा देने की जहमत उठा सकते थे। साथ ही में आरटीआई कानून का संशोधित विधेयक को प्रभावित होने वाले तथा इससे जुड़े लोगों के बीच विचार-विमर्श को रखने की शर्त को भी दरकिनार किया गया। इससे साफ होता हैं कि वर्ष 2014 के पूर्व-विधान परामर्श नीति का भी उल्लंघन करने का काम इस जल्दबाजी में हुआ हैं।

जल्दबाज़ी में कैसे कह सकते हैं… क्या इससे पहले कोशिश नहीं की गई…?

बिल्कुल सही कहा आपने…केंद्र सरकार ने ठीक 1 वर्ष पूर्व इस तरह की नाकाम कोशिश की थी। चूंकि चुनाव कुछ ही महीनों में होने वाला था। इसलिए तब बवाल न मचे और उनकी मंशा जगजाहिर न हो, इसलिए सरकार ने एक कदम पीछे लेते हुए खुद को अलग कर लिया। दुर्भाग्य से विपक्ष इस चाल को समझने में नाकाम रहा और तत्कालिक जीत पर रणनीति नहीं समझ पाया। आज पूरे देश में इसे लेकर बवाल मचा हैं और पुरजोर विरोध भी हो रहा हैं। संसद की लड़ाई में विपक्ष हार चुका है और बयानबाजी से इस संशोधन को रोका नहीं जा सकता है। इसलिए अब अदालत में गुहार लगाकर समझाना पड़ेगा कि आरटीआई कानून में हुआ संशोधन आम लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन हैं।

नया संशोधित विधेयक क्या है?

आरटीआई के नए संशोधित विधेयक में कहा गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों तथा राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निबंधन एवं शर्ते केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाएंगे। मूल कानून में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का वेतन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों के बराबर रखा गया था। नए संशोधन विधेयक के पैरा 3 और 5 में उद्देश्य और कारण वाले खंड में ही नई बातें जोड़ी गई हैं। यह पहली बार नहीं हुआ हैं। सरकाए ने वर्ष 2018 में भी कोशिश की थी जिसे भारी भरकम विरोध के बाद बंद किया गया था और संशोधन को प्रलंबित रखा गया था।

बीजेपी पर ही दोष क्यों ? इससे पहले क्या कांग्रेस इस बात को लेकर ईमानदार थी?

यह बात दीगर है उसके आरटीआई को लाने का श्रेय कांग्रेस को जाता है लेकिन वह भी इस कानून को लेकर ईमानदार नहीं थी। पहले कांग्रेस अब भाजपा, दोनों ही एक ही थाली के चट्टे- बट्टे हैं । क्योंकि गत 14 वर्षो में अगनित बार आरटीआई क़ानून से येनकेन प्रकारेण छेड़छाड़ की गई। आज भाजपा सत्ता में हैं जो आरटीआई कानून के संशोधन को जायज ठहरा रही हैं और विपक्ष में बैठा हर दल चाहे कांग्रेस हो या अन्य दल,इसे गलत बता रहा है। भाजपा जब विपक्ष में थी तब भी कांग्रेस ने आरटीआई कानून को सीमाओं में बांधने का काम किया था और सत्ता में बैठी कांग्रेस इसे सही ठहराकर विरोध की परवाह नहीं करती थी। यानी सत्ता में आसीन दल आरटीआई विरोधी होता हैं और विपक्ष में बैठा दल आरटीआई की पैरोकारी करता हैं। आरटीआई से खुश कोई नहीं दिखता। दूसरों की नंगई सबको अच्छी लगती है लेकिन जब खुद नंगे होने की बात आती है तो बुरा लगता है ।यही बात राजनीतिक दलों के साथ है आरटीआई उनको नंगा करने का काम करती है। और खुद को नंगा देखना किसे पसंद हो सकता है?

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