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नौकरी छोड़ किया 13 महीने तक फुटवर्क, लिखी गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन पर किताब

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नई दिल्ली, 21 जनवरी। ‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’ अक्सर ये कहावत सिर्फ कहावत ही रह जाती है लेकिन हममें से बेहद कम लोग ही इन कहावतों को साकार रूप दे पाते हैं। ये कहावत फिट बैठती है ऑल इंडिया रेडियो की नौकरी छोड़ 13 महीने तक फुटवर्क कर पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन पर किताब लिखने वाले अमित राजपूत पर।

नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता के छात्र रहे और आकाशवाणी महानिदेशालय दिल्ली से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष कार्यक्रम ‘मन की बात’ से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत करने वाले अमित के मन में कुछ और ही चल रहा था। अमित ने अपने मन की आवाज सुनी और नौकरी छोड़ किताब लिखने का मन बनाया।

नौकरी छोड़ने के दौरान मिले रुपये और अपनी थोड़ी बहुत सेविंग के जरिए अमित ने करीब 13 महीनों तक कानपुर, इलाहाबाद और फतेहपुर में पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन पर शोध और फुटवर्क कर सामग्री जुटाते रहे। इस दौरान विद्यार्थी जी के जीवन के कई ऐसे किस्से सामने आए जो आम तौर पर उनकी किताबों में अंकित नहीं हैं।

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद के रहने वाले अमित ने बताया कि चंद लोगों की वजह से गणेश शंकर विद्यार्थी सिर्फ पत्रकारिता तक सीमित रह गए हैं। किसी ने भी इस बात का जिक्र नहीं किया कि कैसे उन्होंने राष्ट्रवाद का बीज बोने में अहम भूमिका निभाई। अमित ने अपनी किताब में विद्यार्थी जी के जीवन पर कई किस्से अंकित किए हैं। लखनऊ के लोकोदय प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का नाम ‘अंतर्वेद प्रवर’ है।

बता दें कि करीब 150 पन्नों की यह पुस्तक का फिलहाल कवर पेज सामने आया है। वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने इस किताब का कवर लॉन्च किया है। इस मौके पर अमित को बधाई देते हुए राम बहादुर राय ने कहा, गणेश शंकर विद्यार्थी पर पुन: चर्चा इस पुस्तक के जरिए जो होगी वह नई पीढ़ी को प्रेरणा दे सकेगी।

यह पुस्तक आधुनिक भारत के पत्रकार-श्रेष्ठ गणेश शंकर विद्यार्थी को एक ऐसे अमर शहीद योद्धा के नज़रिये से देखती है, जिन्होंने हिन्दुस्तान में संगठित राष्ट्रवाद का बीज बोया था। इसके लिए उनके आसपास यथा कर्मभूमि और विशेषकर उनके पैतृक परिवेश से उनके सरोकारों का लेखा-जोखा इस पुस्तक में संग्रहित किया गया है। उम्मीद जताई जा रही है कि अमित राजपूत की यह किताब मार्च के आखिरी सप्ताह तक लॉन्च हो सकती है। इस किताब की कीमत 140 रुपये तय की गई है।