America George Floyd murdered Winston Churchill mahatma gandhi

Winston Churchill को उनके ही देश में लिखा जा रहा नस्लवादी, कहा था “लोकतंत्र भारतीयों के लिए ठीक नहीं”

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(America, George Floyd murdered) अमरीका में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या से फूटा गुस्सा पश्चिमी दुनिया की कथित समानता और कई नेताओं की कथित महानता को चौराहे पर घसीट लाया है। यहां जमा लोग ‘आई कांट ब्रीद’ कहते हुए उनकी प्रतिमाएं ढहा रहे हैं; उन लोगों की ओर से जिन्हें उनके उन ‘महान’ पूर्वजों ने कभी गुलाम बनाया था, कोड़े बरसाए थे, लाखों को गोलियों से उड़ावा दिया और हजारों-हजार को जेलों में सड़ा कर भूखों मर डाला; नस्लवादी लिखकर उनके किए का हिसाब मांग रहे हैं। घुटन से मुक्त होने के लिए लोग सदियों पीछे चले गए हैं।

Priyanshu | New Delhi

ब्रिटेन में ऑक्सफर्ड के बाहर छात्र का हुजूम प्रदर्शन कर रहा है। उनकी मांग है कि ओरियल कॉलेज के बाहर लगी ब्रिटिश साम्राज्यवादी सेसिल रोड्स की प्रतिमा हटाई जाए। सेसिल रोड्स उन लोगों में थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को दक्षिण अफ्रीका में फैलाया और लाखों अफ्रीकियों से बेगारी कराई। इससे पहले प्रदर्शनकारी लंदन में लगी 17वीं सदी के मानव तस्कर एडवर्ड कॉल्स्टन की मूर्ति तोड़कर नदी में फेंक चुके हैं। कॉल्स्टन भी ब्रिटिश थे।

सोमवार को लोगों ने लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर पर लगी अपने ‘वारटाइम प्राइम मिनिस्टर’ विंस्टन चर्चिल की प्रतिमा पर नस्लभेदी लिख दिया। ब्रिटेन के सबसे चर्चित नेता, नोबेल विजेता, दूसरे विश्व युद्ध में दुनिया को हिटलर से बचाने वाले चर्चिल को अपने ही देश में कभी ऐसा दिन देखना पड़ेगा, किसने सोचा था; यह जानते हुए भी चर्चिल कोई छिपे हुए नस्लभेदी नहीं थे।

1937 में उन्होंने कहा था कि “मैं नहीं मानता कि (गुलामी के दिनों में) अमरीकियों के साथ गलत किया गया या ऑस्ट्रेलिया के अश्वेतों के साथ बहुत गलत बर्ताव हुआ। वह एक दौड़ थी उच्च श्रेणी की, बुद्धिमानी की जिसमें हमने उन्हें पीछे छोड़ा।”

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चर्चिल का भारत से खास तरह का रिश्ता था, हालांकि वह शायद ही कभी यहां आए। उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन को लीड कर रहे महात्मा गांधी से जितनी चिढ़ थी, भारत में ब्रिटिश हुकूमत से उतना ही लगाव था। बतौर प्रधानमंत्री चर्चिल 1945 का चुनाव हारते नहीं तो शायद हमें आजादी के लिए और इंतजार करना पड़ता। इतिहासकार पैट्रिक फ्रैंच अपनी मशहूर किताब ‘Liberty or Death: India’s Journey to Independence and Division’ में लिखते हैं कि, “चर्चिल इस बात में यकीन रखते थे कि नस्ली रूप से गोरे सर्वश्रेष्ठ हैं। वह यह सुनने तक को तैयार नहीं थे कि भारतीय राष्ट्रीयता का कोई औचित्य है।” एक बार तो चर्चिल यहां तक कह गए कि लोकतंत्र भारतीयों के लिए ठीक नहीं है।

‘डाली से लटका हुआ जानवर’
गांधी को अध-नंगा आदमी कहने वाले चर्चिल को भारत से जबरदस्त मोह था। इसके आकार और खूबसूरती को लेकर उन्होंने तय किया था कि यह ब्रिटेन के बाद दूसरी मनमोहक जगह होगी। चर्चिल के समकालीन उन्हें भारत के प्रति ‘उन्माद में पागल’ कहते हैं। लॉर्ड लिनलिथगो ने उन्हें डाली से लटका हुआ ऐसा जानवर तक कह डाला, जो भारत के हित में कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था।

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‘गांधी मध्यम दर्जे का वकील है’
गांधी-इरविन समझौता चर्चिल की नजर में घृणित था। बकौल चर्चिल, “वह (गांधी) एक मध्यम दर्जे का राजद्रोही वकील है और अब एक फकीर बनने का ढोंग कर रहा है। वह अध-नंगा होकर वाइस-रीगल पैलेस में घुसने का प्रयास कर रहा है जबकि वह अब भी खुल्लम-खुल्ला आज्ञा का उल्लंघन करने वाला अभियान चला रहा है। ऐसा व्यक्ति भारत में केवल गड़बड़ी फैलाकर गोरों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।”

तब के अधिकांश रूढ़िवादी ईसाई साम्राज्यवादी थे और इनके नेता थे चर्चिल जिनका मानना था कि भारत की ‘देखभाल’ के लिए अंग्रेजों को एक ‘ईश्वरीय मिशन’ सौंपा गया है।