ambedkar jayanti 2019 : dr. babasaheb bhimrao ramji ambedkar The Father of Indian Constitution

संविधान बनाते समय मेडिकल स्टोर के दुकानदार की भूमिका निभा रहे थे अंबेडकर…

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नन्दिनी राजौरिया | भोपाल

दलित समाज को नयी पहचान देने वाले डॉक्टर भीमराव रामजी अंबेडकर के बारे में कुछ कम पढ़े-लिखे लोगों की राय है कि उन्होंने सिर्फ़ दलितों के लिए ही काम किया। असल में, उन्होंने दलितों के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय समाज के लिए काम किया था। उन्हें लेकर कहा जाता है कि संविधान अंबेडकर ने नहीं बनाया। हाँ, जो भी ऐसा कहता है, बिल्कुल सही कहता है। बाबा साहेब तो संविधान बनाते समय एक मेडिकल स्टोर के दुकानदार की भूमिका निभा रहे थे और यह बता रहे थे कि देश की किस बीमारी के लिए कौन-सी दवा (नियम) कारगर है। उस वक़्त उस मेडिकल स्टोर रूपी संविधान का ज्ञान भी सिर्फ़ उन्हें ही था।

हमारे संविधान में देश के नागरिकों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात का ज़िक्र है। बाबा साहेब ने महिलाओं के लिए क़ानून, काम के घंटे, बाल विवाह आदि कई तरह के विषयों पर क़ानून बनाये। उन्होंने सोचा था कि इन क़ानूनों के चलते समाज का उत्थान हो सकेगा। बेशक, कुछ हद तक ऐसा हुआ भी। हम ‘जेल’ से निकले तो, लेकिन नियमों और शर्तों के साथ।

बाबा साहेब ने काम के घंटों को लेकर नियम बनाये। श्रम और रोजगार से जुड़े नियमों के अनुसार महिला और पुरुष को समान वेतन देने की बात कही गयी। काम के दौरान महिला और पुरुष में भेदभाव न करने की बात तय हुई। लेकिन क्या असल में इन नियमों से कुछ फ़ायदा हो रहा है? अफ़सोस है कि हालात में बहुत बदलाव नहीं आ सका।

लड़कियों को काम करने की आज़ादी तो दी गयी, लेकिन आज भी जब वे किसी कम्पनी में काम के लिए जाती हैं तो उनसे पहला सवाल यही होता है-‘आपकी शादी हो गयी?’ अगर लड़की ‘हाँ’ कह देती है तो कोई न कोई बहाना बनाकर उसे मना कर दिया जाता है। बेरोज़गारी के चलते काम के घंटों को 10 से 12 रखा जाता है और उसे कागज़ों पर सिर्फ़ आठ घंटे ही दिखाया जाता है।

इतना ही नहीं, अगर कोई महिला अपने वैधानिक अधिकार के तहत मातृत्व अवकाश लेती है, तो उसे काम से निकाल दिया जाता है। पूरे प्राइवेट सेक्टर का यही हाल है। निजी क्षेत्र में काम करने वालों के शोषण से जुड़ी ऐसी कई चीज़ें हैं, लेकिन पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बोझ और बेरोज़गारी के चलते कोई भी आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

बाबा साहेब ने कहा था-‘किसी समुदाय ने कितनी प्रगति की है, उसे मैं इस तथ्य से नापता हूँ कि उस समाज की महिलाओं ने कितनी प्रगति की है। ‘इस बात में कोई शक नहीं कि समाज में महिलाओं के प्रति थोड़ी जागरूकता बढ़ी है, लेकिन उन्हें वे पूरे अधिकार आज भी नहीं मिले, जो बाबा साहेब ने महिलाओं को दिये थे। जैसे, दूसरी शादी का अधिकार, तलाक लेने का अधिकार, पैतृक सम्पत्ति पर अधिकार, माँ द्वारा अपने नाबालिग़ बच्चे के अभिभावक को बदल सकने का अधिकार। पर, क्या महिलाओं ने सच में इतनी तरक़्क़ी की है, जितनी उनके अपने समुदाय द्वारा दर्शायी जाती है।

तलाक़ और पैतृक सम्पत्ति के अधिकारों जैसी चीज़ें सिर्फ़ अमीरों और अपर मीडिल क्लास के लोगों में ही देखने को मिलती हैं। आज भी मीडिल क्लास और निर्धन वर्ग की महिलाओं को अपने हक़ के लिए लड़ने का मौक़ा नहीं दिया जाता। पैतृक सम्पत्ति का मतलब सिर्फ़ बेटी की अच्छे से शादी करना नहीं है, बल्कि उसे सम्पत्ति में हिस्सा देना है। रिश्तों और भावनाओं के नाम पर महिलाओं से उनके अधिकार छीन लिये जाते हैं।

डॉक्टर भीमराव रामजी आम्बेडकर ने तमाम नागरिक अधिकार महिलाओं और देश के हर नागरिक को दिये हैं। इसके बावज़ूद इन अधिकारों पर उतना अमल नहीं होता, जितना होना चाहिए और अमल में रुकावट डालने वालों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है। अगर कोई आवाज़ उठाना भी चाहे तो उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। अक्सर ऐसी आवाज़ों को डरा-धमका कर दबा दिया जाता है। ऐसे हालात में यही कहा जा सकता है-बाबा साहेब के सभी सार्थक प्रयास अमल में नाकामी के चलते अपने आप ही निरर्थक हो जाते हैं।