अल्हड़ बीकानेरी की कविताएं

अल्हड़ बीकानेरी जिन्होंने कभी बीकानेर नहीं देखा

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अल्हड़ बीकानेरी का जन्म 17 मई, 1937 को हरियाणा के रेवाड़ी जिले के बीकानेर गांव में हुआ था। उनके नाम में लगे बीकानेर से लोग उन्हें राजस्थानी समझ बैठते थे लेकिन उनकी एक कविता में वो कहत हैं कि कैसा क्रूर भाग्य का चक्कर, कैसा विकट समय का फेर। कहलाते हम बीकानेरी, कभी न देखा बीकानेर।

जीवन परिचय

बचपन अल्हड़ बीकानेरी का मन संगीत, साहित्य और नाटकों के मंचन में रमने लगा था, मगर उनके पिताजी उन्हें इंजीनियर बनाने पर तुले हुए थे। उन्होंने अहीर कॉलेज में दाखिला लिया प्रथम साल में प्रमोट और सैकिंड इयर में फेल हो जाने के बाद 2 मई, 1955 में उनका विवाह हो गया। 23 जनवरी, 1971 को उन्होंने लाल किला कवि सम्मेलन में पहली बार काव्य-पाठ किया। उनके अनेक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। हिन्दी और उर्दू के शब्दकोश उनके लेखन कक्ष में उनके तकिये के दायीं ओर बहुत सलीके से रखे हुए नज़र आते थे।

समाज अल्हड़ बीकानेरी की कविताओं की प्रयोगशाला था। जिन सामाजिक रूढिय़ों, आर्थिक दुष्चिन्ताओं, राजनीतिक विडम्बनाओं, प्रशासनिक विसंगतियों ने उनके अंतर्मन को भीतर तक कचोटा था, वे उनकी कविताओं में साफ दिखाई देती थी। अल्हड़ बीकानेरी जी की अधिकांश कविताओं की पृष्ठभूमि में भजनों और धार्मिक रचनाओं का जो प्रतिबिम्ब नज़र आता है, उसका सन्दर्भ भी उनके निजी जीवन से जुड़ा हुआ था।

उन्होंने लगभग 15 पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘भज प्यारे तू सीताराम’, ‘घाट-घाट घूमे’, ‘अभी हंसता हूं’, ‘अब तो आंसू पोंछ’, ‘भैंसा पीवे सोम रस’, ‘ठाठ गजल के’, ‘रेत का जहाज’ एवं ‘अनछुए हाथ’, ‘खोल देना द्वार’ और ‘जय मैडम की बोल रे’ प्रसिद्ध रही।

अल्हड़ बीकानेरी की कुछ प्रसिद्ध कविताएं

01

आदि से अनूप हूँ मैं

आदि से अनूप हूँ मैं, तेरा ही स्वरूप हूँ मैं
मेरी भी कथाएँ हैं अनन्त मेरे राम जी
लागी वो लगन तुझसे कि मन मस्त हुआ
दृग में समा गया दिगन्त मेरे राम जी

सपनों में आ के कल बोले मेरी बुढ़िया से
बाल-ब्रह्मचारी हनुमन्त मेरे राम जी
लेता है धरा पे अवतार जाके सदियों में
‘अल्हड़’ सरीखा कोई सन्त मेरे राम जी

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02

ग़ज़ल हो गई

लफ़्ज़ तोड़े मरोड़े ग़ज़ल हो गई
सर रदीफ़ों के फोड़े ग़ज़ल हो गई
लीद करके अदीबों की महफि़ल में कल
हिनहिनाए जो घोड़े ग़ज़ल हो गई

ले के माइक गधा इक लगा रेंकने
हाथ पब्लिक ने जोड़े गज़ल हो गई
पंख चींटी के निकले बनी शाइरा
आन लिपटे मकोड़े ग़ज़ल हो गई

03

पल में काँटा बदल गया

कूड़ा करकट रहा सटकता, चुगे न मोती हंसा ने
करी जतन से जर्जर तन की लीपापोती हंसा ने
पहुँच मसख़रों के मेले में धरा रूप बाजीगर का
पड़ा गाल पर तभी तमाचा, साँसों के सौदागर का
हंसा के जड़वत् जीवन को चेतन चाँटा बदल गया

तुलने को तैयार हुआ तो पल में काँटा बदल गया
रिश्तों की चाशनी लगी थी फीकी-फीकी हंसा को
जायदाद पुरखों की दीखी ढोंग सरीखी हंसा को
पानी हुआ ख़ून का रिश्ता उस दिन बातों बातों में
भाई सगा खड़ा था सिर पर लिए कुदाली हाथों में
खड़ी हवेली के टुकड़े कर हिस्सा बाँटा बदल गया

खेल-खेल में हुई खोखली आख़िर खोली हंसा की
नीम हक़ीमों ने मिल-जुलकर नव्ज़ टटोली हंसा की
कब तक हंसा बंदी रहता तन की लौह सलाखों में
पल में तोड़ सांस की सांकल प्राण आ बसे आंखों में
जाने कब दारुण विलाप में जड़ सन्नाटा बदल गया

मिला हुक़म यम के हरकारे पहुँचे द्वारे हंसा के
पंचों ने सामान जुटा पाँहुन सत्कारे हंसा के
धरा रसोई, नभ रसोइया, चाकर पानी अगन हवा
देह गुंदे आटे की लोई मरघट चूल्हा चिता तवा
निर्गुण रोटी में काया का सगुण परांठा बदल गया

04

हे दयालु नेता

तुम्हीं हो भाषण, तुम्हीं हो ताली
दया करो हे दयालु नेता
तुम्हीं हो बैंगन, तुम्हीं हो थाली
दया करो हे दयालु नेता

तुम्हीं पुलिस हो, तुम्हीं हो डाकू
तुम्हीं हो ख़ंजर, तुम्हीं हो चाकू
तुम्हीं हो गोली, तुम्हीं दुनाली
दया करो हे दयालु नेता

तुम्हीं हो इंजन, तुम्हीं हो गाड़ी
तुम्हीं अगाड़ी, तुम्हीं पिछाड़ी
तुम्हीं हो ‘बोगी’ की ‘बर्थ’ खाली
दया करो हे दयालु नेता
तुम्हीं हो चम्मच, तुम्हीं हो चीनी

तुम्हीं ने होठों से चाय छीनी
पिला दो हमको ज़हर की प्याली
दया करो हे दयालु नेता

तुम्हीं ललितपुर, तुम्हीं हो झाँसी
तुम्हीं हो पलवल, तुम्हीं हो हाँसी
तुम्हीं हो कुल्लू, तुम्हीं मनाली
दया करो हे दयालु नेता

तुम्हीं बाढ़ हो, तुम्हीं हो सूखा
तुम्हीं हो हलधर, तुम्हीं बिजूका
तुम्हीं हो ट्रैक्टर, तुम्हीं हो ट्राली
दया करो हे दयालु नेता

तुम्हीं दलबदलुओं के हो बप्पा
तुम्हीं भजन हो तुम्हीं हो टप्पा
सकल भजन-मण्डली बुला ली
दया करो हे दयालु नेता

पिटे तो तुम हो, उदास हम हैं
तुम्हारी दाढ़ी के दास हम हैं
कभी रखा ली, कभी मुंड़ा ली
दया करो हे दयालु नेता

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05

मुझको सरकार बनाने दो

जो बुढ्ढे खूसट नेता हैं, उनको खड्डे में जाने दो।
बस एक बार, बस एक बार मुझको सरकार बनाने दो।

मेरे भाषण के डंडे से
भागेगा भूत गरीबी का।
मेरे वक्तव्य सुनें तो झगडा
मिटे मियां और बीवी का।
मेरे आश्वासन के टानिक का
एक डोज़ मिल जाए अगर,
चंदगी राम को करे चित्त
पेशेंट पुरानी टी बी का।

मरियल सी जनता को मीठे, वादों का जूस पिलाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।

जो कत्ल किसी का कर देगा
मैं उसको बरी करा दूँगा,
हर घिसी पिटी हीरोइन कि
प्लास्टिक सर्जरी करा दूँगा;
लडके लडकी और लैक्चरार
सब फिल्मी गाने गाएंगे,
हर कालेज में सब्जैक्ट फिल्म
का कंपल्सरी करा दूँगा।

हिस्ट्री और बीज गणित जैसे विषयों पर बैन लगाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।

जो बिल्कुल फक्कड हैं, उनको
राशन उधार तुलवा दूँगा,
जो लोग पियक्कड हैं, उनके
घर में ठेके खुलवा दूँगा;
सरकारी अस्पताल में जिस
रोगी को मिल न सका बिस्तर,
घर उसकी नब्ज़ छूटते ही
मैं एंबुलैंस भिजवा दूँगा।

मैं जन-सेवक हूँ, मुझको भी, थोडा सा पुण्य कमाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।

श्रोता आपस में मरें कटें
कवियों में फूट नहीं होगी,
कवि सम्मेलन में कभी, किसी
की कविता हूट नहीं होगी;
कवि के प्रत्येक शब्द पर जो
तालियाँ न खुलकर बजा सकें,
ऐसे मनहूसों को, कविता
सुनने की छूट नहीं होगी।

कवि की हूटिंग करने वालों पर, हूटिंग टैक्स लगाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।

ठग और मुनाफाखोरों की
घेराबंदी करवा दूँगा,
सोना तुरंत गिर जाएगा
चाँदी मंदी करवा दूँगा;
मैं पल भर में सुलझा दूँगा
परिवार नियोजन का पचडा,
शादी से पहले हर दूल्हे
की नसबंदी करवा दूँगा।

होकर बेधडक मनाएंगे फिर हनीमून दीवाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।

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06

कुत्ते तभी भौंकते हैं

रामू जेठ बहू से बोले, मत हो बेटी बोर
कुत्ते तभी भौंकते हैं जब दिखें गली में चोर
वफ़ादार होते हैं कुत्ते, नर हैं नमक हराम
मिली जिसे कुत्ते की उपमा, चमका उसका नाम

दिल्ली क्या, पूरी दुनिया में मचा हुआ है शोर
हैं कुत्ते की दुम जैसे ही, टेढ़े सभी सवाल
जो जबाव दे सके, कौन है वह माई का लाल
देख रहे टकटकी लगा, सब स्वीडन की ओर
प्रजातंत्र का प्रहरी कुत्ता, करता नहीं शिकार
रूखा-सूखा टुकड़ा खाकर लेटे पाँव पसार

बँगलों के बुलडॉग यहाँ सब देखे आदमख़ोर
कुत्ते के बजाय कुरते का बैरी, यह नाचीज़
मुहावरों के मर्मज्ञों को, इतनी नहीं तमीज़
पढ़ने को नित नई पोथियाँ, रहे ढोर के ढोर

दिल्ली के कुछ लोगों पर था चोरी का आरोप
खोजी कुत्ता लगा सूँघने अचकन पगड़ी टोप
जकड़ लिया कुत्ते ने मंत्री की धोती का छोर
तो शामी केंचुआ कह उठा, ‘हूँ अजगर’ का बाप
ऐसी पटकी दी पिल्ले ने, चित्त हुआ चुपचाप
साँपों का कर चुके सफाया हरियाणा के मोर।

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