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PM मोदी के ‘डिजिटल इंडिया’ पर आज भी भारी नज़र आती है अखिलेश यादव की लैपटॉप वितरण योजना !

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आपको ऐसा लगेगा की आज से 6 से 7 वर्ष पूर्व बंद हो चुकी एक योजना का ज़िक्र 2020 में पीएम मोदी की सबसे महात्वकांक्षी योजना डिजिटल इंडिया से क्यों किया जा रहा है ? भले ही ये योजना वर्षों पूर्व बंद हो चुकी हो मगर इस योजना का लाभ आज भी देखने को नज़र आ रहा है । आप पूछेंगे कि वो कैसे ? मैंने पिछले कुछ समय से देखता आ रहा हूं कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छात्र आज भी इस लैपटॉप की मदद से यूपीएसी जैसे इग्ज़ाम की तैयारियां करते हैं ।

हालंकि, न तो यूपी में सपा सरकार है न ही उसकी चलाई गई ये योजना । मगर सपा सरकार द्वारा इस योजना के अनतर्गत बांटे गए लैपटॉप्स की मदद से हज़ारों छात्रों ने रोज़गार प्राप्त किया है । आज भी जब मैं गांव की ओर निकलता हूं, तो तमाम छात्रों को इसी लैपटॉप से पढ़ाई करते हुए पाता हूं। वर्षो बाद भी इस योजना से छात्रों को लाभ होता दिख रहा है इस लिय बंद हो जाने के बाद भी आज इसका ज़िक्र ज़रूरी है ।

मई 2014 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद पीएम मोदी ने विकास की कई योजना की घोषणाएं की थीं । इन योजनाओं में सबसे ज़्यादा प्रचार-प्रसार मोदी सरकार ने जिस योजना का किया वो डिजिटल इंडिया योजना रही ।प्रधानमंत्री मोदी इस योजना का ज़िक्र अपनी अधिकतर रैलियों में करते रहे हैं । 2014 में एक रैली को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने ज़ोर देकर कहा था कि डिजिटल इंडिया के चलते देश बदल रहा है। डिजिटल इंडिया का शुरू से ही संकल्प रहा है कि देश के सामान्य व्यक्ति, युवाओं और ग्रामीणों को डिजिटल बनाना है। मोदी सरकार दावा करती रही है कि डिजिटल इंडिया से लोगों को नौकरियां मिलती रही हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि डिजिटल इंडिया से सबसे ज़्यादा फ़ायदा गांवों की महिलाओं को हुआ है । उन्होंने कहा था कि डिजिटल इंडिया के तहत शुरू किए गए वाई फ़ाई चौपाल योजना से गांवों की बेटियां नौकरी पा रही हैं ।

क्या है डिजिटल इंडिया ?

डिजिटल इंडिया वो कार्यक्रम है जिसके तहत हर जगह लोगों तक इंटरनेट के माध्यम से सर्विस पहुंचाना है। ई-डिस्ट्रिक्ट बनाना, ई-गवर्नेंस के तहत सभी सेवाओं को ऑनलाइन करने जैसी बातें हैं।

आइये पहले हम केंद्र में मोदी सरकार के आने से एक वर्ष पूर्व 2013 में उत्तर प्रदेश में सपा सरकार की एक महात्वकांक्षी लैपटाप वितरण योजना की बात करते हैं । 11 मार्च 2013 को अखिलेश यादव ने लखनऊ के 10 हजार विद्यार्थियों को मुफ्त लैपटॉप बांटकर इस महत्वाकांक्षी योजना का श्रीगणेश किया था ।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार ने कहा था कि 2013 में उन्होने 15 लाख स्टूडेंट्स को फ्री में लैपटॉप बांटे । लैपटाप की संख्या को लेकर विवाद होता रहा है मगर इस योजना के ज़मीन पर उतरने के बाद सबसे ज़्यादा तारीफ अखिलेश की हुई । देश-विदेश में भी इस योजना को काफी पसंद किया गया । बीते वर्ष 2019 में इस लैपटाप वितरण योजना की चर्चा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में भी काफी हुई थी । अखिलेश यादव की स्टूडेंट्स को फ्री लैपटॅाप देने की योजना को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में भी बहुत पसंद किया गया था।

गांव-ग्रामीण में बसने वाले छात्रों तक लैपटाप पहुंचा सरकार का काफी इनोवेटिव आईडिया था । हज़ारों-लाखों छात्र-छात्राएं जो कभी लैपटाप के विषय में कुछ नहीं जानते थे, उनको इस योजना के तहत लैपटाप मिलने के बाद डिजिटल दुनिया में क़दम रखने का मौका मिला । कई छात्र तो आज भी सपा सरकार में बांटे गए फ्री लैपटाप की मदद से अपनी पढ़ाई करते दिख जाते हैं ।

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हालांकि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी सरकार का पद भार संभालने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट समेत कई योजनाओं की जांच के आदेश दे दिए थे। एक RTI के जवाब में यह जानकारी मिली थी कि सपा ने करीब 15 लाख लैपटॉप खरीदे थे। जिनमें से सिर्फ 6 लाख के आस-पास ही लैपटॉप को बांटा गया था।

लेखक शांतनु गुप्ता की किताब “उत्तर प्रदेश-विकास की प्रतीक्षा में” को लिखने के लिए 2016 में एक आरटीआई फाइल की गई थी। शांतनु बताते हैं कि आरटीआई के मुताबिक 2012 से 2014 तक सपा सरकार ने 14 लाख 81 हजार 118 लैपटॉप खरीदकर प्रदेश के जिलों में भेजे। इनमें से बच्चों को सिर्फ 6 लाख 11 हजार 794 लैपटॉप बांटे गए। बाकी बचे 8 लाख 69 हजार 324 लैपटॉप कहां गए इसकी सरकारी रिकॉर्ड में कोई जानकारी नहीं मिली है। एक समाजवादी लैपटॉप की कीमत 13490 बताई गई है। इसके हिसाब से करीब 1173 करोड़ रुपए कीमत के लैपटॉप गायब थी।

3000 हज़ार करोड़ की मूर्ति से बेहतर थी सपा की लैपटाप वितरण योजना ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का 31 अक्टूबर, 2018 को अनावरण किया था। मूर्ति के निर्माण के लिए केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद अक्टूबर 2014 मेंलार्सन एंड टूब्रो कंपनी को ठेका दिया गया था । माना गया है कि इसके निर्माण में करीब 3000 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।

इस मूर्ति पर हज़ारों करोड़ रूपय खर्च करने के बाद सरकार की काफी आलोचना हुई है । सरकार का दावा है कि इस मूर्ति के माध्यम से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और सरकार के ख़ज़ाने में भारी रकम आएगी । मगर अभी तक ऐसा कुछ होता दिखा नहीं है । नौबत तो यहां तक आ पहुंची है कि मूर्ति की देख-रेख करने वाले कर्मचारियों की सैलरी तक देने के पैसे सरकार नहीं जुटा पा रही है ।

वहीं, अगर 2013 में अखिलेश सरकार की लैपटाप वितरण योजना की बात करें तो सपा सरकार ने 2012 के अपने पहले बजट में  लैपटॉप और टैबलेट के लिए 2,721 करोड़ रुपये के प्रावधान किया था । ज़मीनी स्तर पर आने के बाद इस योजना ने हज़ारों छात्रों का भविष्य बदला है । यूपी के गांव-गांव तक लैपटॉप पहुंचा कर सपा सरकार ने लाखों छात्रों को टेक्नॉलाजी और डिजिटल दुनिया से जोड कर उनके भविष्य को बदलने का प्रयास किया । भले ही बाद में सपा सरकार ने अपनी इस योजना को बंद कर दिया हो मगर 2020 आने जाने के बाद भी हज़ारो छात्रों के हाथों में सपा सरकार का बांटा वो लैपटाप दिख जाता है ।

डिजिटल इंडिया पर पीएम मोदी के दावे और ज़मीनी हक़ीक़त ?

1 जुलाई, 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल इंडिया लॉन्च किया था। इसके कई मकसद थे। इनमें से मुख्य, ग्रामीण इलाकों को हाई स्पीड इंटरनेट नेटवर्क से कनेक्ट करना और डिजिटल लिटरेसी को बेहतर करना। अब तक डिजिटल इंडिया का रेस्पॉन्स क्या है?

ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी कहने को तो पहुंच रही है, लेकिन इसे इस्तेमाल कैसे किया जाए ये साफ नहीं है। कई ग्रामीण इलाकों का हाल ये है कि वहां फाइबर पहुंचा दिए गए हैं। कंप्यूटर्स भी उपलब्ध कराए गए हैं, लेकिन अब आगे क्या किया जाएगा, अब तक कुछ नहीं दिखता है।

जुलाई 2018 में पीएम मोदी ने कहा कि डिजिटल इंडिया इनिशिएटिव से देश में 3 लाख जॉब्स बने हैं और सिटिजन जागरूक हुए हैं। पीएम ने कहा है कि 3 लाख कॉनम सर्विस सेंटर का नेटवर्क तैयरा किया गया है जिन्हें डिजिटल सर्विस डिलिवरी का ऐक्सेस प्वॉइंट के तौर पर यूज किया जाता है। डिजिटल इंडिया के बारे में पीएम मोदी का कहना है कि डिजिटल एंपावरमेंट का हर ऐस्पेक्ट काम कर रहा है। इनमें गांवों में फाइबर ऑप्टिक्स बिछाने से लेकर डिजिटल लिटरेसी तक शामिल है।

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डिजिटल साक्षरता अभियान (DISHA) की बात करें तो इसका मकसद 2020 तक हर फैमिली में से कम से कम किसी एक को डिजिटल साक्षर बनाना है। 2 लाख 50 हजार ग्राम पंचायत को वाईफाई से जोड़ना और ब्रॉडबैंड मुहैय्या कराना है। सरकार का दावा है कि डिजिटल इंडिया से लोगों को नौकरियां भी मिल रही हैं।

ज़मानी हक़ीकत क्या है ?

डिजिटल मामलों के जानकार और डिजिटल एम्पॉवरमेंट फ़ाउंडेशन के संस्थापक निदेशक ओसामा मंज़र कहते हैं, “डिजिटल इंडिया के तहत लोगों को कैशलेस करने के चक्कर में बहुत परेशानी हुई है। गांवों में इंटरनेट काम नहीं करता है। पिछले दो चार सालों से एयरटेल जैसी कंपनियां भी संघर्ष कर रही हैं। सरकारी बीएसएनएल कंपनी का नेटवर्क हर जगह है, लेकिन बहुत सुस्त है। इन पर लोड ज़्यादा हो गया है। सरकार योजनाओं की घोषणा कर देती है, लेकिन ज़मीन पर लागू नहीं होती।”

प्रधानमंत्री ने कहा था कि डिजिटल इंडिया से सबसे ज़्यादा फ़ायदा गांवों की महिलाओं को हुआ है। उन्होंने कहा कि डिजिटल इंडिया के तहत शुरू किए गए वाई फ़ाई चौपाल योजना से गांवों की बेटियां नौकरी पा रही हैं। क्या डिजिटल इंडिया से सबसे ज़्यादा फ़ायदा गांवों की महिलाओं को हुआ है?

ओसामा मंज़र कहते हैं, “लोग ख़ुद से स्मार्टफ़ोन ख़रीद लें और सरकार दावा करे कि उसने सब कुछ सही कर दिया है। स्थिति यह है कि ग्रामीण इलाकों की 92 फ़ीसदी औरतों के पास मोबाइल फ़ोन नहीं है। बात अगर पूरे देश की करें तो 72 फ़ीसदी महिलाओं के पास मोबाइल नहीं है। टीआरएआई के आंकड़ों में एक अरब लोगों के कनेक्शन की बात की जाती है वो सिम के कनेक्शन की बात करते हैं न कि इंटरनेट की।”

2013 में यूपी में सपा सरकार द्नारा छात्रों को लैपटॉप बांटने की योजना भाजपा के डिजिटल इंडिया पर आज भी भारी नज़र आती है । गांव के ग़ंरीब छात्र तक इस योजना का सीधा लाभ पहुंचा और उसे आगे उन्नति के रास्ते बनाने में मदद मिली। इतना वर्ष पुरानी योजना का इय समय डिजिटल इंडिया से तुलना करने का मक़सद सिर्फ यही है कि योजना और नारों में ज़मान-आसमान का फर्क हुआ करता है ।

भाजपा सरकार दिल्ली की सत्ता पर दोबारा पूर्ण बहुमत के साथ क़ाबिज़ हुई है। केंद्र में पिछले 6 सालों से सरकार ने दर्जनो योजना को महज़ नारों तक ही सामित कर दिया । 2020 में हालही में चर्चा का केंद्र में जो नारा आया वो रहा आत्मनिर्भर भारत, जिसे पीएम मोदी ने कोरोनाकाल के दौरान देश को इस बीमारी से लड़ने के लिए दिया है ।

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