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सही मायने में देखा जाए तो अकाली दल ही लड़ रहा है किसानों की लड़ाई

akali dal and farmers protest
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यह बात पढ़ने में शायद एकतरफा लगे लेकिन इस पर सोचा जा सकता है। अकाली दल (SAD) को छोड़ कर कोई भी राजनीतिक दल कृषि कानून के मुद्दे पर सड़क पर क्यों नहीं दिखाई देता। संसद में विरोध प्रदर्शन हो या सड़क पर विरोध प्रदर्शन अकाली दल सबसे आगे खड़ा दिखाई देता है।

किसान आंदोलन को एक वर्ष पूरा होने वाला है। किसान अपनी लड़ाई खुद ही लड़ रहे हैं। तमाम राजनीतिक दल केवल उनके नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे हुए हैं।

अगर देखा जाए तो राजनीतिक दलों का काम ही यही है, अगर उन्हें अपनी राजनीतिक ज़मीन खिसकती हुई न दिखाई दे तो वो अपने आलावा किसी की सोचे भी न। किसान आंदोलन में भी यही देखने को मिल रहा है। पिछले एक वर्ष से कृषि कानूनों को वापस लेने के मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर अपनी आंख मूंद ली है। वहीं विपक्षी दल इसका फायदा चुनाव में उठाना चाहते हैं।

अकाली दल और किसान आंदोलन

जब केंद्र सरकार ने 3 कृषि बिल संसद से पारित करवा लिए तब जाकर राजनीतिक दलों को समझ आया की यह तो गलत हो गया। तब अकाली दल भाजपा का गठजोड़ था। किसानों के छुटपुट प्रदर्शन हो रहे थे जिनपर मीडिया का भी ध्यान नहीं गया था। लेकिन जैसे ही इस मुद्दे पर अकाली दल ने भाजपा से अपना वर्षों पुराना गठबंधन तोड़ने का ऐलान किया तब देश को समझ आया कि यह मुद्दा कितना गंभीर है।

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तब तक सरकार भी इसे विपक्षी दलों की राजनीति बताकर टाल रही थी। लेकिन जैसे ही उनके वर्षों पुराने सहयोगी दल ने इस बिल के विरोध में उनका साथ छोड़ा एक पर के लिए उनकी भी नींद उड़ गई। मीडिया में अचानक कृषि बिल में क्या खामियां हैं पर चर्चाएं होने लगी। मेरा मानना है कि असल मायने में अकाली भाजपा गठबंधन में टूट ने बाकि राजनीतिक दलों की आंखे इस मुद्दे पर खोली।

किसान मुद्दे पर अकाली दल ही सड़क पर देता है दिखाई

किसानों ने अपनी लड़ाई अकेले ही लड़ने का फैसला किया है। उन्होने राजनीतिक दलों को अपने आंदोलन से दूर रखा। कांग्रेस ने कोशिश की इसमें शामिल होने की लेकिन किसानों के एतराज़ के बाद वो घर बैठ गए और एक आध बार मीडिया में खबर बनाने के लिए ट्रैक्टर पर बैठकर राहुल गांधी संसद पहुंच गए। उसके बाद की राजनीति वो अब सोशल मीडिया पर ही कर रहे हैं। पंजाब के कुछ दिन पहले तक मुख्यमंत्री रहे अमरिंदर सिंह ने तो कह दिया कि किसान दिल्ली जाकर आंदोलन करें पंजाब में हो हल्ला करने से कुछ नहीं होगा। जब उनकी कुर्सी चली गई तो वो इस मुद्दे पर अमित शाह से मिलने गए। आम आदमी पार्टी और बाकि के दल इस उम्मीद में बैठे रहे कि लड़ाई भाजपा के खिलाफ है तो उन्हें तो वोट मिल ही जाएंगे। हालांकि एक दो बार संसद में उन्होंने भी किसानों की आवाज़ उठाई कुछ प्रदर्शन भी किए लेकिन फिर ठंडे होकर बैठ गए।

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इस पूरे वर्ष के राजनीतिक दलों के कृषि कानूनों के विरोध में हुए प्रदर्शनों को देखा जाए तो यह बात साफ नज़र आएगी की किसानों से इतर अकाली दल इन बिलों का लगातार विरोध प्रदर्शन करता रहा और यह अभी भी जारी है। सड़क से लेकर संसद तक अकाली दल का विरोध दिखाई दिया। संसद के सत्र के दौरान हर दिन अकाली सांसद तख्तियां लिए खड़े दिखाई दिये। उनके नेताओं ने कानून के विरोध में अपनी गिरफ्तारियां दी। वो सड़क पर उतरे और विरोध किया। अकाली दल ने यह साफ कर दिया कि वो इन कानूनों की वापसी के लिए कितने गंभीर हैं।

लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं, इस लेख में दिए गए तथ्यों की पुष्टी ग्राउंड रिपोर्ट नहीं करता।

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