जाने उस कविता के बारे में जिसे हमेशा अटल जी दोहराते थे…क्या हार में क्या जीत में

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फीचर स्टोरी/ न्यूज डेस्क।  भारत के दसवें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज देहवासन के बाद पहला जन्मदिन है। उनके चाहने वाले अपने अपने तरह से उन्हें श्रद्धांजली दे रहे हैं। आपको बता दें, अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन 25 दिसंबर को मनाया जाता है, साल 2018 की 16 अगस्त को उनका देहांत हो गया था।

देश ने अपने इस लाडले प्रधानमंत्री को शानदार विदाई दी थी। आज पूरा देश उनके न होने का एहसास कर रहा है बल्कि जनमानस में भारतीय राजनीति में एक एतिहासिक शख्सियत की खला को उनकी वाक् चातुर्य से भरता भी नजर आता है।

कई वक्तव्य , कई जनसभाएं, कई यादें अटल जी के जाने के बाद अटल ही हैं। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के युग पुरूष थे। उनकी संप्रेषण (Communication) की कला पर भारतीय ही नहीं दुनिया भी मोहित थी। कहते हैं जो भी अटल जी मुख से निकला वह शब्द , वो कविता , वो भाषण उनका ही होकर रह गया।

अमूमन अपना लिखने वाले अटल जी हमेशा एक कविता दोहराते थे। उस कविता के रचियता शिव मंगल सिंह सुमन थे लेकिन जब यही कविता अटल जी के ओजस्वी स्वर से होकर जनमानस तक पहुंची तो सुमन जी की यह कविता अटल जी कविता हो गई। कई बार लोग इस कविता को अटल जी की मानते हैं। आएं जाने उस कविता के बारे में जिसे हमेशा अटल जी दोहराते थे…

यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं

स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं

क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही
वरदान माँगूँगा नहीं

लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं

चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं