सवाल अब ‘प्रेस की आज़ादी’ पर नहीं, ‘प्रेस के अस्तित्व’ पर ख़तरे का है: दिलीप पांडेय

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देश में प्रेस की आज़ादी की मंदी आ गई है और ऐसे में सभी आज़ाद पत्रकारों की छटनी की जा रही है। नहीं-नहीं, आप गलत समझे हैं। छटनी के बाद ईमानदार रखे नहीं जा रहे, बल्कि उन ईमानदारी के अन्नकणों को चुन चुन कर फेंका जा रहा है, और थाली में रखे जा रहे हैं कंकड़।

बात शुरू हुई थी प्रेस की आज़ादी से और आ पहुंची है प्रेस के अस्तित्व पर। अब टीवी स्क्रीन पर दिखने वाले पत्रकार देश और खबरों को नहीं, खुद को बचाने के प्रयास में दिख रहे हैं। जो बचा पाए हैं, वो अंदर तक या तो डर से डरे हुए हैं या फिर धन से भरे हुए हैं। कुछ मुट्ठी भर वो भी हैं, जो अपने लिए डरे नहीं, लेकिन दिन-रात अपने परिवार के लिए डरते हुए भी सच के साथ खड़े हैं। मीडिया मोदी सरकार के राज में घुटनों पर नहीं, बल्कि रेंगने पर आ गया है।

एबीपी न्यूज़ से पहले निकले मिलिंद खांडेकर, फिर पुण्य प्रसून वाजपेयी जी को दफ़्तर से घर भेज दिया गया, कभी न लौटने के फरमान के साथ। सरकार के खिलाफ जम कर बरस रहे अभिसार शर्मा को छुट्टी मनाने भेजा गया है, बस बहाली कब होगी ये मालूम नहीं।

रविश कुमार के प्राइम टाइम के दौरान बार बार टीवी स्क्रीन उड़ जाया करती। कहने वाले कहते ये कनेक्शन की गड़बड़ी है, सही कहते थे। लेकिन कनेक्शन टीवी का नहीं, सरकार और प्रेस की आज़ादी के बीच का खराब था। एनडीटीवी पर वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगाकर छापा मार दिया और बाद में एक दिन का बैन भी लगा दिया। इस बीच रवीश कुमार ने पूरी स्क्रीन काली करके हिटलरशाही के मुंह पर कालिख पोत दी।

पुण्य प्रसून वाजपेयी के मास्टरस्ट्रोक ने तो सरकारी आसमान का मौसम बिगाड़ दिया, और फिर ऐसे बादल गरजे कि मास्टरस्ट्रोक की स्क्रीन भी आये दिन काली होने लगी। लोगों ने सोशल मीडिया पर शिकायतें करनी शुरू की, लोग हैरान थे कि कैसे हर उस एक शो में कनेक्शन की गड़बड़ी हो जाती है जो मोदी सरकार की आलोचना कर रहा होता है?

अभिसार शर्मा चैनल में जिस सरकारी आलोचना के लिए आज़ाद नहीं थे, अपने फेसबुक से उसकी भरपाई कर रहे थे। अब नोटबंदी को कोई बुरा कहेगा, काला धन वापिस कब आएगा, जैसे जवाब मांगे जाएंगे, तो बदले में उसे ईनाम के तौर पर लंबी छुट्टी मिलना तो तय है ना?

इसके बीच सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी के समर्पण के भाव को भी तो नकारा नहीं जा सकता। बरखा दत्त, सागरिका, राजदीप सरदेसाई, राणा अय्यूब, निधि राजदान जैसे पत्रकार तो बस एक दिन बिना गालियाँ और धमकी सुने पत्रकारिता करने की उम्मीद में ही जी रहे हैं।

लेकिन ये तो वो लोग हैं, जो कम से कम ज़िंदा तो हैं। 2013 के बाद देश भर में 17 पत्रकार ऐसे भी हैं, जिनसे सच बोलने की नहीं, बल्कि जीने की आज़ादी ही छीन ली गई। दैनिक अखबार के नवीन निश्चल, पत्रिका अखबार के जय सिंह, संदीप शर्मा, रेडियो जॉकी राजेश को बड़ी क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया गया।

दैनिक जागरण के मिथिलेश पांडेय, tv24 के हेमंत यादव,पत्रिका के अजय विद्रोही, आजतक के अक्षय सिंह, नई दुनिया के कमलेश जैन और अजय कोठारी, जन संदेश के करुण मिश्रा,दैनिक हिंदुस्तान के राजदेओ राजन, दैनिक भास्कर के धर्मेंद्र सिंह और सबसे ताज़ा मामला लंकेश पत्रिका की गौरी लंकेश। ये वो पत्रकार हैं, जो या तो सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ लिख रहे थे,या फिर सरकारी महकमों में अपराध की बू के खिलाफ या फिर देश में बढ़ रही धार्मिक कट्टरता के खिलाफ।

सब बढ़िया ही चल रहा है। कुछ दो दर्जन भर पत्रकारों की हत्या को छोड़ दें तो क्या बिगड़ा? तीन चार बड़े नामी पत्रकार खुले आम चैनल से निकाल दिए तो कौन सा पहाड़ टूट गया?मास्टरस्ट्रोक क्या सिर्फ पुण्य प्रसून खेल सकते हैं? मोदी जी नहीं खेलेंगे? साल-दो साल से लगातार मोदी जी से सवाल पूछने वाले अभिसार ने कभी पंडित नेहरू से तो सवाल नहीं किया? क्या हुआ अगर वो उस समय पैदा नहीं हुए थे। अब तो पूछ सकते हैं?क्या मोदी जी नहीं पूछते?

अब आप हैरान न हों, ये सोचकर कि ये ख़बर सिवाय सोशल मीडिया के टीवी पर क्यों नहीं देखने को मिल रही? ये भी मत सोचिए कि अरविंद केजरीवाल के खिलाफ एडवाइजरी निकालने वाली एडिटर गिल्ड कहाँ गई? ये भी न सोचें कि खुद मिलिंद,वाजपेयी और शर्मा जैसे बेबाक पत्रकार चुप क्यों हैं? किसी की शाह-मत थोड़े आई है। और फिर कौन इतनी व्यस्तता में किसी पत्रकार के साथ आकर खड़ा हो।

जी-हुज़ूरी में अभी बढ़िया कट रही है सबकी ज़िन्दगी। ये तो मोदी सरकार से चिढ़ते हैं लोग, जो झूठ फैला रहे हैं। अगर सरकार प्रेस की आज़ादी छीन रही होती तो क्या पत्रकार नोट की चिप ढूँढ़ पाते? एलियन धरती पर न्यूज़रूम में स्पेसशिप उतार पाते? क्या मंगल पर बैठी बूढ़ी औरत का स्कैच हम और आप देख पाते?

ऑन ए सीरियस नोट: नेशन रियली वांट्स टू नो – डरा हुआ इंसान किसी दूसरे को कैसे डरा सकता है? 4 साल में कभी रीढ़-दार पत्रकारों के सामने बैठने की हिम्मत न जुटा पाने वाले मोदी जी,क्या अब टीवी के भीतर बैठे पत्रकारों से भी काँपने लगे हैं? जनता उतना ही देखे, जो आप दिखाना चाहते हैं, ऐसे देश की कल्पना,आप बस कल्पना में ही कर सकते हैं। क्योंकि डरा हुआ कौन दिख रहा है, ये सवाल एक बार खुद से पूछ लिजिये। या खुद के सवाल से भी डर गए मोदी जी? इतना डर क्यों? उफ़ ये डर, इसी डर पर मेरी कविता की कुछ पंक्तियां:

गर सोचते हो,
कि ये सियासी नशा,
ये तक़ाबूर-ओ-ग़ुरूर,
तुम्हारे हमदम हैं,
तो सुनो! वो कब्र की ओर बढ़ते,
तुम्हारे ही कदम हैं!



लेखक दिलीप पांडेय आम आदमी पार्टी के नेता हैं। इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह से लेखक के निजी विचार हैं। ग्राउंड रिपोर्ट द्वारा इस लेख में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। हम अभिव्यक्ति की आज़ादी को सर्वोपरि मानते हैं।

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