पत्र: न उंगली काँपी, न सरकार का दिल पसीजा, आशा है मां गंगा भगीरथ को आँँचल में भर लेंंगी

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प्रिय,
जीडी अग्रवाल जी, जनता के लाडले सदानंद महाराज, आईआईटी के प्रोफेसर और गंगा पुत्र, हमारे कथानकों की कालजयी रचना के भगीरथ! नमन! 112 दिन के आमरण अनशन और प्राण त्याग नहीं भूल पायेगा वो हर एल शख़्स जो चाहता है गंगा को अविरल करना, देश के बड़े हिस्से की जीवनदायनी माँ को पवित्र देखना, पतित पाविनी माँ गंगा।

लेकिन साहब आप तो चले गए लेकिन मेरे जैसे अनगिनत लोगों के लिए शिकायतों की फेहरिस्त छोड़ गए। छोड़ गए बहुत कुछ  बस सोचने ….

सरकार से शिकायत है, ऐसे भेड़ियों से भी है जो बस जलते तबे पर बिना कोई सहायता किये सिर्फ रोटी सेंकना और खाना जानते हैं। गंगापुत्र सदानन्द जी आपने जरा भी विचार नहीं किया कि आप क्या थे और क्या होकर कहाँ चले गए।

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आपको लाज नहीं आयी इस नपुंसक समाज को कहते हुए की गंगा मैया को बचा लो, सोये हुए सिस्टम से गुहार लगाते जो आमरण को मरण में तब्दील करने लगा, आपको जरा भी नहीं लगा कि प्रोफेसर की हैसियत क्या होती है।

मैंने झुकते देखा कई प्रोफेसर को इस सिस्टम के आगे लेकिन आपको नहीं यह शिकायत है। शिकायत की आप चले गए अपनी प्राण की आहुति देकर । आपको लगा आपके मरने के बाद शायद समाज चेतेगा। आपको लगा कि सोया हुआ सिसटम जागेगा लेकिन आपको बता दूं प्रोफेसर साहब यह सिस्टम सो गया है, सत्ता मिलने के बाद, अंग्रेजों का दिल पसीज जाता था जब कोई आमरण अनशन पर बैठ जाता था, पर यह सरकार नहीं पसीजी।

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कंप्यूटर पर उंगली नहीं काँपी उस शख्स की जो कंप्यूटर स्क्रीन पर मोदी जी का ट्वीट लिख रहा था आपको श्रद्धांजलि देते हुए। मोदी जी सीएम अच्छे रहे होंगे, पर एक प्रधानमंत्री के तौर पर इतने पत्थर दिल होंगे सोचा नहीं। बस यही शिकायत है कि आप अपने इस छोटे भाई को आंक नहीं पाए।

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बहुत कुछ गंगा माँ ने दिया बहुत कुछ ले लिया। आपको मां गंगा अपने आँचल में जगह दे, ऋषिकेश की वादियों में गंगा अविरल का नारा गूंजे, पर आपको समझना था इस सोये हुए सिस्टम को, इस नपुंसक समाज को, इस पत्थर दिल और बनावटी गंगा पुत्र को। आते रहना ऐसे ही हर किसी मानव की आत्मा में सदाशिव होकर, जटा समाहित गंगा को बचाने।

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नमन💐