देश की यूनिवर्सिटीज़ में शिक्षकों के 80 हज़ार से अधिक पद खाली, सरकार इन्हें कब भरेगी?

Higher education fund is less to meet demands of central univercities in India
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ग्राउंड रिपोर्ट । न्यूज़ डेस्क

भारत विश्व गुरु बनने के सपने देखता है लेकिन देश का भविष्य जो सरकारी कॉलेजों में पढ़ रहा है उन्हें गुरु उपलब्द्ध करवाना उसकी प्राथमिकता ही नहीं है। भारत में उच्च शिक्षा के विस्तार और विकास की समीक्षा करने के लिए बनाई गई संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेज में खाली पड़े 80 हज़ार पदों पर चिंता जताई है। इस रिपोर्ट में बताया गया कि सरकार की ओर से जारी किया जाने वाला बजट भारत में उच्च शिक्षा के विकास के लिए नाकाफी है। इस बजट से युनिवर्सिटी और कॉलेजों की मूल भूत ज़रुरतें भी पूरी नहीं की जा सकती।

संसदीय समिति द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि कॉलेजों में प्रोफेसर की भर्ती प्रक्रिया सालाना दर पर करनी होगी ताकि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी बड़ी समस्या न बनें।

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उच्च शिक्षा विभाग ने 2020-21 के लिए 58,250 करोड़ रुपए मांगे थे लेकिन सरकार द्वारा बजट में केवल 39,466 करोड़ ही आवंटित किए गए जो कि 18 हज़ार 784 करोड़ कम हैं। बजट में यह कटौति उच्च शिक्षा के विस्तार और विकास पर प्रभाव डालेगी। केंद्र द्वारा फंडेड विश्वविद्यालयों में 34 फीसदी पद खाली हैं, एनआईटी में 37 फीसदी और राज्य द्वारा फंडेड युनिवर्सिटी में 35 फीसदी पद खाली हैं।

समिति के सुझाव

सरकार द्वार फंडेड यूनिवर्सिटीज़ का फंड बढ़ाया जाए क्योंकि विश्वविद्यालय समाज के लिए सेवा देते हैं। रिक्त स्थानों की पूर्ती सालाना दर पर की जाए ताकि खाली पड़े पदों की वजह से शिक्षा के स्तर पर असर न हो। पद खाली होने के पहले ही भर्ती प्रक्रिया शुरु की जाए ताकि जब पद खाली हो तो उसी दिन से नया व्यक्ति रिक्त स्थान की पूर्ती कर सके।

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देश में युवा बड़ी मात्रा में उच्च शिक्षा ग्रहण कर रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं पीएचडी और नेट पास करने के बाद भी उनके पास नौकरी नहीं है। कई योग्य युवा कॉलेजों में कॉट्रेक्ट बेसिस पर पढ़ा रहे हैं। उन्हें स्थाई नौकरी देने के बारे में सरकार नहीं सोचती । खाली पड़े पदों को भरने से न केवल कई युवाओं को रोज़गार मिलेगा बल्कि शिक्षा के स्तर में भी सुधार होगा। सरकार को इस समिति की रिपोर्ट पर गौर करना चाहिए।

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